महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 986, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभ्यगच्छन्त सुप्रीताः सर्व एव महर्षयः । आशीर्वादन् प्रयुञ्जानाः स्वाध्यायनिरता भृशम् ॥ ३६ ॥ प्रीतास्ते तस्य सत्कारं विधिना पावकोपमाः । उपजह्रुश्च सलिलं पुष्पमूलफलं शुचि ॥ ३७ ॥ वह शोभासम्पन्न आश्रम अवर्णनीय था। देवोचित कार्योंका अनुष्ठान उसकी शोभा बढ़ाता था। उस आश्रममें फल-मूल खाकर रहनेवाले, कृष्णमृगचर्मधारी, जितेन्द्रिय, अग्नि तथा सूर्यके समान तेजस्वी और तपःपूत अन्तःकरणवाले महर्षि, मोक्षपरायण, इन्द्रिय-संयमी संन्यासी तथा महान् सौभाग्यशाली ब्रह्मवादी ब्रह्मभूत महात्मा निवास करते थे। महातेजस्वी, बुद्धिमान् धर्मपुत्र युधिष्ठिर पवित्र और एकाग्रचित्त होकर भाइयोंके साथ उन आश्रमवासी महर्षियोंके पास गये। युधिष्ठिरको आश्रममें आया देख वे दिव्यज्ञानसम्पन्न सब महर्षि अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे मिले और उन्हें अनेक प्रकारके आशीर्वाद देने लगे। सदा वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर रहनेवाले उन अग्नितुल्य तेजस्वी महात्माओंने प्रसन्न होकर युधिष्ठिरका विधिपूर्वक सत्कार किया और उनके लिये पवित्र फल-मूल, पुष्प और जल आदि सामग्री प्रस्तुत की ॥ ३२–३७ ॥ स तैः प्रीत्याथ सत्कारमुपनीतं महर्षिभिः । प्रयतः प्रतिगृह्याथ धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ३८ ॥ महर्षियोंद्वारा प्रेमपूर्वक प्रस्तुत किये हुए उस आतिथ्य-सत्कारको शुद्ध हृदयसे ग्रहण करके धर्मराज युधिष्ठिर बड़े प्रसन्न हुए ॥ ३८ ॥ तं शक्रसदनप्रख्यं दिव्यगन्धं मनोरमम् । प्रीतः स्वर्गोपमं पुण्यं पाण्डवः सह कृष्णया ॥ ३९ ॥ विवेश शोभया युक्तं भ्रातृभिश्च सहानघ । ब्राह्मणैर्वेदवेदाङ्गपारगैश्च सहस्रशः ॥ ४० ॥ उन्होंने भाइयों तथा द्रौपदीके साथ इन्द्रभवनके समान मनोरम और दिव्य सुगन्धसे परिपूर्ण उस स्वर्ग-सदृश शोभाशाली पुण्यमय नर-नारायण आश्रममें प्रवेश किया। अनघ! उनके साथ ही वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् सहस्रों ब्राह्मण भी प्रविष्ट हुए ॥ ३९-४० ॥ तत्रापश्यत धर्मात्मा देवदेवर्षिपूजितम् । नरनारायणस्थानं भागीरथ्योपशोभितम् ॥ ४१ ॥ धर्मात्मा युधिष्ठिरने वहाँ भगवान् नर-नारायणका स्थान देखा, जो देवताओं और देवर्षियोंसे पूजित तथा भागीरथी* गंगासे सुशोभित था ॥ ४१ ॥ पश्यन्तस्ते नरव्याघ्रा रेमिरे तत्र पाण्डवाः । मधुस्रवफलं दिव्यं ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ॥ ४२ ॥ तदुपैत्य महात्मानस्तेऽवसन् ब्राह्मणैः सह । मुदा युक्ता महात्मानो रेमिरे तत्र ते तदा ॥ ४३ ॥