भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 985, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 985

ततस्तमाश्रमं रम्यं नरनारायणाश्रितम् । ददृशुः पाण्डवा राजन् सहिता द्विजपुङ्गवैः ॥ २६ ॥ राजन्! तदनन्तर ब्राह्मणोंसहित पाण्डवोंने एक साथ भगवान् नर-नारायणके उस रमणीय स्थानका दर्शन किया ॥ २६ ॥

तमसा रहितं पुण्यमनामृष्टं रवेः करैः । क्षुत्तृट्शीतोष्णदोषैश्च वर्जितं शोकनाशनम् ॥ २७ ॥ जो अन्धकार एवं तमोगुणसे रहित तथा पुण्यमय था। (वृक्षोंकी सघनताके कारण) सूर्यकी किरणें उसका स्पर्श नहीं कर पाती थीं। वह आश्रम भूख, प्यास, सर्दी और गरमी आदि दोषोंसे रहित और सम्पूर्ण शोकोंका नाश करनेवाला था ॥ २७ ॥

महर्षिगणसम्बाधं ब्राह्म्या लक्ष्म्या समन्वितम् । दुष्प्रवेशं महाराज नरैर्धर्मबहिष्कृतैः ॥ २८ ॥ महाराज! वह पावन तीर्थ महर्षियोंके समुदायसे भरा हुआ और ब्राह्मी श्रीसे सुशोभित था। धर्महीन मनुष्योंका वहाँ प्रवेश पाना अत्यन्त कठिन था ॥ २८ ॥

बलिहोमार्चितं दिव्यं सुसम्मृष्टानुलेपनम् । दिव्यपुष्पोपहारैश्च सर्वतोऽभिविराजितम् ॥ २९ ॥ वह दिव्य आश्रम देव-पूजा और होमसे अर्चित था। उसे झाड़-बुहारकर अच्छी तरह लीपा गया था। दिव्य पुष्पोंके उपहार सब ओरसे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ २९ ॥

विशालैरग्निशरणैः स्रुग्भाण्डैराचितं शुभैः । महद्भिस्तोयकलशैः कठिनैश्चोपशोभितम् ॥ ३० ॥ विशाल अग्निहोत्रगृहों और स्रुक्, स्रुवा आदि सुन्दर यज्ञपात्रोंसे व्याप्त वह पावन आश्रम जलसे भरे हुए बड़े-बड़े कलशों और बर्तनोंसे सुशोभित था ॥ ३० ॥

शरण्यं सर्वभूतानां ब्रह्मघोषनिनादितम् । दिव्यमाश्रयणीयं तमाश्रमं श्रमनाशनम् ॥ ३१ ॥ वह सब प्राणियोंके शरण लेनेयोग्य था। वहाँ वेदमन्त्रोंकी ध्वनि गूँजती रहती थी। वह दिव्य आश्रम सबके रहनेयोग्य और थकावटको दूर करनेवाला था ॥

श्रिया युतमनिर्देश्यं देवचर्योपशोभितम् । फलमूलाशनैर्दान्तैश्चारुकृष्णाजिनाम्बरैः ॥ ३२ ॥ सूर्यवैश्वानरसमैस्तपसा भावितात्मभिः । महर्षिभिर्मोक्षपरैर्यतिभिर्नियतेन्द्रियैः ॥ ३३ ॥ ब्रह्मभूतैर्महाभागैरुपेतं ब्रह्मवादिभिः । सोऽभ्यगच्छन्महातेजास्तानृषीन् प्रयतः शुचिः ॥ ३४ ॥ भ्रातृभिः सहितो धीमान् धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । दिव्यज्ञानोपपन्नास्ते दृष्ट्वा प्राप्तं युधिष्ठिरम् ॥ ३५ ॥

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