भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 984, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 984

तस्याभ्याशे तु ददृशुर्नरनारायणाश्रमम् ॥ १८ ॥ उपेतं पादपैर्दिव्यैः सदापुष्पफलोपगैः । ददृशुस्तां च बदरीं वृत्तस्कन्धां मनोरमाम् ॥ १९ ॥ स्निग्धामविरलच्छायां श्रिया परमया युताम् । पत्रैः स्निग्धैरविरलैरुपेतं मृदुभिः शुभाम् ॥ २० ॥ वह पर्वतीय प्रदेश मतवाले विहंगों और अगणित वृक्षोंसे युक्त था। पाण्डवोंने उत्तम समृद्धिसे सम्पन्न बहुत-से देशोंको लाँघकर भाँति-भाँतिके आश्चर्यजनक दृश्योंसे सुशोभित पर्वतश्रेष्ठ कैलासका दर्शन किया। उसीके निकट उन्हें भगवान् नर-नारायणका आश्रम दिखायी दिया, जो नित्य फल-फूल देनेवाले दिव्य वृक्षोंसे अलंकृत था। वहीं वह विशाल एवं मनोरम बदरी भी दिखायी दी, जिसका स्कन्ध (तना) गोल था। वह वृक्ष बहुत ही चिकना, घनी छायासे युक्त और उत्तम शोभासे सम्पन्न था। उस शुभ वृक्षके सघन कोमल पत्ते भी बहुत चिकने थे ॥ १७–२० ॥

विशालशाखां विस्तीर्णामतिद्युतिसमन्विताम् । फलैरुपचितैर्दिव्यैराचितां स्वादुभिर्भृशम् ॥ २१ ॥ मधुस्रवैः सदा दिव्यां महर्षिगणसेविताम् । मदप्रमुदितैर्नित्यं नानाद्विजगणैर्युताम् ॥ २२ ॥ उसकी डालियाँ बहुत बड़ी और बहुत दूरतक फैली हुई थीं। वह वृक्ष अत्यन्त कान्तिसे सम्पन्न था। उसमें अत्यन्त स्वादिष्ट दिव्य फल अधिक मात्रामें लगे हुए थे। उन फलोंसे मधुकी धारा बहती रहती थी। उस दिव्य वृक्षके नीचे महर्षियोंका समुदाय निवास करता था। वह वृक्ष सदा मदोन्मत्त एवं आनन्दविभोर पक्षियोंसे परिपूर्ण रहता था ॥ २१-२२ ॥

अदंशमशके देशे बहुमूलफलोदके । नीलशाद्वलसंच्छन्ने देवगन्धर्वसेविते ॥ २३ ॥ सुसमीकृतभूभागे स्वभावविहिते शुभे । जातां हिममृदुस्पर्शे देशेऽपहतकण्टके ॥ २४ ॥ उस प्रदेशमें डाँस और मच्छरोंका नाम नहीं था। फल-मूल और जलकी बहुतायत थी। वहाँकी भूमि हरी-हरी घाससे ढकी हुई थी। देवता और गन्धर्व वहाँ वास करते थे। उस प्रदेशका भूभाग स्वभावतः समतल और मंगलमय था। उस हिमाच्छादित भूमिकी स्पर्श अत्यन्त मृदु था। उस देशमें काँटोंका कहीं नाम नहीं था। ऐसे पावन प्रदेशमें वह विशाल बदरी वृक्ष उत्पन्न हुआ था ॥ २३-२४ ॥

तामुपेत्य महात्मानः सह तैर्ब्राह्मणर्षभैः । अवतेरुस्ततः सर्वे राक्षसस्कन्धतः शनैः ॥ २५ ॥ उसके पास पहुँचकर ये सब महात्मा पाण्डव उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ राक्षसोंके कंधोंसे धीरे-धीरे उतरे ॥ २५ ॥

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