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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

तस्याभ्याशे तु ददृशुर्नरनारायणाश्रमम् ॥ १८ ॥ उपेतं पादपैर्दिव्यैः सदापुष्पफलोपगैः । ददृशुस्तां च बदरीं वृत्तस्कन्धां मनोरमाम् ॥ १९ ॥ स्निग्धामविरलच्छायां श्रिया परमया युताम् । पत्रैः स्निग्धैरविरलैरुपेतं मृदुभिः शुभाम् ॥ २० ॥ वह पर्वतीय प्रदेश मतवाले विहंगों और अगणित वृक्षोंसे युक्त था। पाण्डवोंने उत्तम समृद्धिसे सम्पन्न बहुत-से देशोंको लाँघकर भाँति-भाँतिके आश्चर्यजनक दृश्योंसे सुशोभित पर्वतश्रेष्ठ कैलासका दर्शन किया। उसीके निकट उन्हें भगवान् नर-नारायणका आश्रम दिखायी दिया, जो नित्य फल-फूल देनेवाले दिव्य वृक्षोंसे अलंकृत था। वहीं वह विशाल एवं मनोरम बदरी भी दिखायी दी, जिसका स्कन्ध (तना) गोल था। वह वृक्ष बहुत ही चिकना, घनी छायासे युक्त और उत्तम शोभासे सम्पन्न था। उस शुभ वृक्षके सघन कोमल पत्ते भी बहुत चिकने थे ॥ १७–२० ॥

विशालशाखां विस्तीर्णामतिद्युतिसमन्विताम् । फलैरुपचितैर्दिव्यैराचितां स्वादुभिर्भृशम् ॥ २१ ॥ मधुस्रवैः सदा दिव्यां महर्षिगणसेविताम् । मदप्रमुदितैर्नित्यं नानाद्विजगणैर्युताम् ॥ २२ ॥ उसकी डालियाँ बहुत बड़ी और बहुत दूरतक फैली हुई थीं। वह वृक्ष अत्यन्त कान्तिसे सम्पन्न था। उसमें अत्यन्त स्वादिष्ट दिव्य फल अधिक मात्रामें लगे हुए थे। उन फलोंसे मधुकी धारा बहती रहती थी। उस दिव्य वृक्षके नीचे महर्षियोंका समुदाय निवास करता था। वह वृक्ष सदा मदोन्मत्त एवं आनन्दविभोर पक्षियोंसे परिपूर्ण रहता था ॥ २१-२२ ॥

अदंशमशके देशे बहुमूलफलोदके । नीलशाद्वलसंच्छन्ने देवगन्धर्वसेविते ॥ २३ ॥ सुसमीकृतभूभागे स्वभावविहिते शुभे । जातां हिममृदुस्पर्शे देशेऽपहतकण्टके ॥ २४ ॥ उस प्रदेशमें डाँस और मच्छरोंका नाम नहीं था। फल-मूल और जलकी बहुतायत थी। वहाँकी भूमि हरी-हरी घाससे ढकी हुई थी। देवता और गन्धर्व वहाँ वास करते थे। उस प्रदेशका भूभाग स्वभावतः समतल और मंगलमय था। उस हिमाच्छादित भूमिकी स्पर्श अत्यन्त मृदु था। उस देशमें काँटोंका कहीं नाम नहीं था। ऐसे पावन प्रदेशमें वह विशाल बदरी वृक्ष उत्पन्न हुआ था ॥ २३-२४ ॥

तामुपेत्य महात्मानः सह तैर्ब्राह्मणर्षभैः । अवतेरुस्ततः सर्वे राक्षसस्कन्धतः शनैः ॥ २५ ॥ उसके पास पहुँचकर ये सब महात्मा पाण्डव उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ राक्षसोंके कंधोंसे धीरे-धीरे उतरे ॥ २५ ॥

ततस्तमाश्रमं रम्यं नरनारायणाश्रितम् । ददृशुः पाण्डवा राजन् सहिता द्विजपुङ्गवैः ॥ २६ ॥ राजन्! तदनन्तर ब्राह्मणोंसहित पाण्डवोंने एक साथ भगवान् नर-नारायणके उस रमणीय स्थानका दर्शन किया ॥ २६ ॥

तमसा रहितं पुण्यमनामृष्टं रवेः करैः । क्षुत्तृट्शीतोष्णदोषैश्च वर्जितं शोकनाशनम् ॥ २७ ॥ जो अन्धकार एवं तमोगुणसे रहित तथा पुण्यमय था। (वृक्षोंकी सघनताके कारण) सूर्यकी किरणें उसका स्पर्श नहीं कर पाती थीं। वह आश्रम भूख, प्यास, सर्दी और गरमी आदि दोषोंसे रहित और सम्पूर्ण शोकोंका नाश करनेवाला था ॥ २७ ॥

महर्षिगणसम्बाधं ब्राह्म्या लक्ष्म्या समन्वितम् । दुष्प्रवेशं महाराज नरैर्धर्मबहिष्कृतैः ॥ २८ ॥ महाराज! वह पावन तीर्थ महर्षियोंके समुदायसे भरा हुआ और ब्राह्मी श्रीसे सुशोभित था। धर्महीन मनुष्योंका वहाँ प्रवेश पाना अत्यन्त कठिन था ॥ २८ ॥

बलिहोमार्चितं दिव्यं सुसम्मृष्टानुलेपनम् । दिव्यपुष्पोपहारैश्च सर्वतोऽभिविराजितम् ॥ २९ ॥ वह दिव्य आश्रम देव-पूजा और होमसे अर्चित था। उसे झाड़-बुहारकर अच्छी तरह लीपा गया था। दिव्य पुष्पोंके उपहार सब ओरसे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ २९ ॥

विशालैरग्निशरणैः स्रुग्भाण्डैराचितं शुभैः । महद्भिस्तोयकलशैः कठिनैश्चोपशोभितम् ॥ ३० ॥ विशाल अग्निहोत्रगृहों और स्रुक्, स्रुवा आदि सुन्दर यज्ञपात्रोंसे व्याप्त वह पावन आश्रम जलसे भरे हुए बड़े-बड़े कलशों और बर्तनोंसे सुशोभित था ॥ ३० ॥

शरण्यं सर्वभूतानां ब्रह्मघोषनिनादितम् । दिव्यमाश्रयणीयं तमाश्रमं श्रमनाशनम् ॥ ३१ ॥ वह सब प्राणियोंके शरण लेनेयोग्य था। वहाँ वेदमन्त्रोंकी ध्वनि गूँजती रहती थी। वह दिव्य आश्रम सबके रहनेयोग्य और थकावटको दूर करनेवाला था ॥

श्रिया युतमनिर्देश्यं देवचर्योपशोभितम् । फलमूलाशनैर्दान्तैश्चारुकृष्णाजिनाम्बरैः ॥ ३२ ॥ सूर्यवैश्वानरसमैस्तपसा भावितात्मभिः । महर्षिभिर्मोक्षपरैर्यतिभिर्नियतेन्द्रियैः ॥ ३३ ॥ ब्रह्मभूतैर्महाभागैरुपेतं ब्रह्मवादिभिः । सोऽभ्यगच्छन्महातेजास्तानृषीन् प्रयतः शुचिः ॥ ३४ ॥ भ्रातृभिः सहितो धीमान् धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । दिव्यज्ञानोपपन्नास्ते दृष्ट्वा प्राप्तं युधिष्ठिरम् ॥ ३५ ॥

अभ्यगच्छन्त सुप्रीताः सर्व एव महर्षयः । आशीर्वादन् प्रयुञ्जानाः स्वाध्यायनिरता भृशम् ॥ ३६ ॥ प्रीतास्ते तस्य सत्कारं विधिना पावकोपमाः । उपजह्रुश्च सलिलं पुष्पमूलफलं शुचि ॥ ३७ ॥ वह शोभासम्पन्न आश्रम अवर्णनीय था। देवोचित कार्योंका अनुष्ठान उसकी शोभा बढ़ाता था। उस आश्रममें फल-मूल खाकर रहनेवाले, कृष्णमृगचर्मधारी, जितेन्द्रिय, अग्नि तथा सूर्यके समान तेजस्वी और तपःपूत अन्तःकरणवाले महर्षि, मोक्षपरायण, इन्द्रिय-संयमी संन्यासी तथा महान् सौभाग्यशाली ब्रह्मवादी ब्रह्मभूत महात्मा निवास करते थे। महातेजस्वी, बुद्धिमान् धर्मपुत्र युधिष्ठिर पवित्र और एकाग्रचित्त होकर भाइयोंके साथ उन आश्रमवासी महर्षियोंके पास गये। युधिष्ठिरको आश्रममें आया देख वे दिव्यज्ञानसम्पन्न सब महर्षि अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे मिले और उन्हें अनेक प्रकारके आशीर्वाद देने लगे। सदा वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर रहनेवाले उन अग्नितुल्य तेजस्वी महात्माओंने प्रसन्न होकर युधिष्ठिरका विधिपूर्वक सत्कार किया और उनके लिये पवित्र फल-मूल, पुष्प और जल आदि सामग्री प्रस्तुत की ॥ ३२–३७ ॥ स तैः प्रीत्याथ सत्कारमुपनीतं महर्षिभिः । प्रयतः प्रतिगृह्याथ धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ३८ ॥ महर्षियोंद्वारा प्रेमपूर्वक प्रस्तुत किये हुए उस आतिथ्य-सत्कारको शुद्ध हृदयसे ग्रहण करके धर्मराज युधिष्ठिर बड़े प्रसन्न हुए ॥ ३८ ॥ तं शक्रसदनप्रख्यं दिव्यगन्धं मनोरमम् । प्रीतः स्वर्गोपमं पुण्यं पाण्डवः सह कृष्णया ॥ ३९ ॥ विवेश शोभया युक्तं भ्रातृभिश्च सहानघ । ब्राह्मणैर्वेदवेदाङ्गपारगैश्च सहस्रशः ॥ ४० ॥ उन्होंने भाइयों तथा द्रौपदीके साथ इन्द्रभवनके समान मनोरम और दिव्य सुगन्धसे परिपूर्ण उस स्वर्ग-सदृश शोभाशाली पुण्यमय नर-नारायण आश्रममें प्रवेश किया। अनघ! उनके साथ ही वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् सहस्रों ब्राह्मण भी प्रविष्ट हुए ॥ ३९-४० ॥ तत्रापश्यत धर्मात्मा देवदेवर्षिपूजितम् । नरनारायणस्थानं भागीरथ्योपशोभितम् ॥ ४१ ॥ धर्मात्मा युधिष्ठिरने वहाँ भगवान् नर-नारायणका स्थान देखा, जो देवताओं और देवर्षियोंसे पूजित तथा भागीरथी* गंगासे सुशोभित था ॥ ४१ ॥ पश्यन्तस्ते नरव्याघ्रा रेमिरे तत्र पाण्डवाः । मधुस्रवफलं दिव्यं ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ॥ ४२ ॥ तदुपैत्य महात्मानस्तेऽवसन् ब्राह्मणैः सह । मुदा युक्ता महात्मानो रेमिरे तत्र ते तदा ॥ ४३ ॥

नरश्रेष्ठ पाण्डव उस स्थानका दर्शन करते हुए वहाँ सब ओर सुखपूर्वक घूमने-फिरने लगे। ब्रह्मर्षियों-द्वारा सेवित जो अपने फलोंसे मधुकी धारा बहानेवाला दिव्य वृक्ष था, उसके निकट जाकर महात्मा पाण्डव ब्राह्मणोंके साथ वहाँ निवास करने लगे। उस समय वे सब महात्मा बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे ।। ४२-४३ ।।

आलोकयन्तो मैनाकं नानाद्विजगणायुतम् ।
हिरण्यशिखरं चैव तच्च बिन्दुसरः शिवम् ।। ४४ ।।
तस्मिन् विहरमाणाश्च पाण्डवाः सह कृष्णया ।
मनोज्ञे काननवरे सर्वर्तुकुसुसोज्ज्वले ।। ४५ ।।
वहाँ सुवर्णमय शिखरोंसे सुशोभित और अनेक प्रकारके पक्षियोंसे युक्त मैनाक पर्वत था। वहीं शीतल जलसे सुशोभित बिन्दुसर नामक तालाब था। वह सब देखते हुए पाण्डव द्रौपदीके साथ उस मनोहर उत्तम वनमें विचरने लगे, जो सभी ऋतुओंके फूलोंसे सुशोभित हो रहा था ।। ४४-४५ ।।

पादपैः पुष्पविकचैः फलभारावनामिभिः ।
शोभिते सर्वतो रम्यैः पुंस्कोकिलगणायुतैः ।। ४६ ।।
उस वनमें सब ओर सुरम्य वृक्ष दिखायी देते थे, जो विकसित फूलोंसे युक्त थे। उनकी शाखाएँ फलोंके बोझसे झुकी हुई थीं। कोकिल पक्षियोंसे युक्त बहुसंख्यक वृक्षोंके कारण उस वनकी बड़ी शोभा होती थी ।। ४६ ।।

स्निग्धपत्रैरविरलैः शीतच्छायैर्मनोरमैः ।
सरांसि च विचित्राणि प्रसन्नसलिलानि च ।। ४७ ।।
उपर्युक्त वृक्षोंके पत्ते चिकने और सघन थे। उनकी छाया शीतल थी। वे मनको बड़े ही रमणीय लगते थे। उस वनमें कितने ही विचित्र सरोवर भी थे, जो स्वच्छ जलसे भरे हुए थे ।। ४७ ।।

कमलैः सोत्पलैश्चैव भ्राजमानानि सर्वशः ।
पश्यन्तश्चारुरूपाणि रेमिरे तत्र पाण्डवाः ।। ४८ ।।
खिले हुए उत्पल और कमल सब ओरसे उनकी शोभाका विस्तार करते थे। उन मनोहर सरोवरोंका दर्शन करते हुए पाण्डव वहाँ सानन्द विचरने लगे ।। ४८ ।।

पुण्यगन्धःसुखस्पर्शो ववौ तत्र समीरणः ।
ह्लादयन् पाण्डवान् सर्वान् द्रौपद्या सहितान् प्रभो ।। ४९ ।।
जनमेजय! गन्धमादन पर्वतपर पवित्र सुगन्धसे वासित सुखदायिनी वायु चल रही थी, जो द्रौपदीसहित पाण्डवोंको आनन्द-निमग्न किये देती थी ।। ४९ ।।

भागीरथीं सुतीर्थां च शीतां विमलपङ्कजाम् ।
मणिप्रवालप्रस्तारां पादपैरुपशोभिताम् ।। ५० ।।
दिव्यपुष्पसमाकीर्णां मनःप्रीतिविवर्धिनीम् ।

वीक्षमाणा महात्मानो विशालां बदरीमनु ।। ५१ ।।

तस्मिन् देवर्षिचरिते देशे परमदुर्गमे ।

भागीरथीपुण्यजले तर्पयांचक्रिरे तदा ।। ५२ ।।

देवानृषींश्च कौन्तेयाः परं शौचमास्थिताः ।

तत्र ते तर्पयन्तश्च जपन्तश्च कुरूद्वहाः ।। ५३ ।।

ब्राह्मणैः सहिता वीरा ह्यवसन् पुरुषर्षभाः ।

कृष्णायास्तत्र पश्यन्तः क्रीडितान्यमरप्रभाः ।

विचित्राणि नरव्याघ्रा रेमिरे तत्र पाण्डवाः ।। ५४ ।।

पूर्वोक्त विशाल बदरीवृक्षके समीप उत्तम तीर्थोंसे सुशोभित शीतल जलवाली भागीरथी

गंगा बह रही थी, उसमें सुन्दर कमल खिले हुए थे। उसके घाट मणियों और मूँगोंसे आबद्ध

थे। अनेक प्रकारके वृक्ष उसके तटप्रान्तकी शोभा बढ़ा रहे थे। वह दिव्य पुष्पोंसे आच्छादित

हो हृदयके हर्षोल्लासकी वृद्धि कर रही थी। उसका दर्शन करके महात्मा पाण्डवोंने उस

अत्यन्त दुर्गम देवर्षिसेवित प्रदेशमें भागीरथीके पवित्र जलमें स्थित हो परम पवित्रताके

साथ देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण किया। इस प्रकार प्रतिदिन तर्पण और जप

आदि करते हुए वे पुरुषश्रेष्ठ कुरुकुल-शिरोमणि वीर पाण्डव वहाँ ब्राह्मणोंके साथ रहने

लगे। देवताओंके समान कान्तिमान् नरश्रेष्ठ पाण्डव वहाँ द्रौपदीकी विचित्र क्रीड़ाएँ देखते

हुए सुखपूर्वक रमण करने लगे ।। ५०-५४ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे

पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४५ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें

गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४५ ।।

  • गौके समान एक प्रकारका जंगली पशु, जिसके गलकंबल नहीं होता।

  • हिमालयपर गिरनेके बाद भागीरथी गंगा अनेक धाराओंमें विभक्त होकर बहने लगीं। उनकी सीधी धारा तो

गंगोत्तरीसे देवप्रयाग होती हुई हरिद्वार आयी है और अन्य धाराएँ अन्य मार्गोंसे प्रवाहित होकर पुनः गंगामें ही मिल गयी

हैं। उन्हींकी जो धारा कैलास और बदरिकाश्रमके मार्गसे बहती आयी है, उसका नाम अलकनन्दा है। वह देवप्रयागमें

आकर सीधी धारामें मिल गयी है। इस प्रकार यद्यपि नर-नारायणका स्थान अलकनन्दाके ही तटपर है, तथापि वह मूलतः

भागीरथीसे अभिन्न ही है; इसीलिये यहाँ मूलमें 'भागीरथी' नामसे ही उसका उल्लेख किया गया है।

१४६-

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षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

भीमसेनका सौगन्धिक कमल लानेके लिये जाना और कदलीवनमें उनकी हनुमान्‌जीसे भेंट

वैशम्पायन उवाच

तत्र ते पुरुषव्याघ्राः परमं शौचमास्थिताः ।
षड्रात्रमवसन् वीरा धनंजयदिदृक्षवः ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! वे पुरुषसिंह वीर पाण्डव अर्जुनके दर्शनके लिये उत्सुक हो वहाँ परम पवित्रताके साथ छः रात रहे ॥ १ ॥

अध्याय (पृष्ठ 990)

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द्रौपदीका भीमसेनको सौगन्धिक पुष्प भेंट करके वैसे ही और पुष्प लानेका आग्रह

ततः पूर्वोत्तरे वायुः प्लवमानो यदृच्छया।

सहस्रपत्रमर्काभं दिव्यं पद्ममुपाहरत् ॥ २ ॥ तदनन्तर ईशानकोणकी ओरसे अकस्मात् वायु चली। उसने सूर्यके समान तेजस्वी एक दिव्य सहस्रदल कमल लाकर वहाँ डाल दिया ॥ २ ॥ तदवैक्षत पाञ्चाली दिव्यगन्धं मनोरमम् । अनिलेनाहृतं भूमौ पतितं जलजं शुचि ॥ ३ ॥ तच्छुभा शुभमासाद्य सौगन्धिकमनुत्तमम् । अतीव मुदिता राजन् भीमसेनमथाब्रवीत् ॥ ४ ॥ जनमेजय! वह कमल बड़ा मनोरम था, उससे दिव्य सुगन्ध फैल रही थी। शुभलक्षणा द्रौपदीने उसे देखा और वायुके द्वारा लाकर पृथ्वीपर डाले हुए उस पवित्र, शुभ एवं परम उत्तम सौगन्धिक कमलके पास पहुँचकर अत्यन्त प्रसन्न हो भीमसेनसे इस प्रकार कहा — ॥ ३-४ ॥ पश्य दिव्यं सुरुचिरं भीम पुष्पमनुत्तमम् । गन्धसंस्थानसम्पन्नं मनसो मम नन्दनम् ॥ ५ ॥ इदं च धर्मराजाय प्रदास्यामि परंतप । हरेदं मम कामाय काम्यके पुनराश्रमे ॥ ६ ॥ ‘भीम! देखो तो, यह दिव्य पुष्प कितना अच्छा और कैसा सुन्दर है! मानो सुगन्ध ही इसका स्वरूप है। यह मेरे मनको आनन्द प्रदान कर रहा है। परंतप! मैं इसे धर्मराजको भेंट करूँगी। तुम मेरी इच्छाकी पूर्तिके लिये काम्यकवनके आश्रममें इसे ले चलो’ ॥ ५-६ ॥ यदि तेऽहं प्रिया पार्थ बहूनीमान्युपाहर । तान्यहं नेतुमिच्छामि काम्यकं पुनराश्रमम् ॥ ७ ॥ ‘कुन्तीनन्दन! यदि मेरे ऊपर तुम्हारा (विशेष) प्रेम है, तो मेरे लिये ऐसे ही बहुत-से फूल ले आओ। मैं इन्हें काम्यक वनमें अपने आश्रमपर ले चलना चाहती हूँ’ ॥ ७ ॥ एवमुक्त्वा शुभापाङ्गी भीमसेनमनिन्दिता । जगाम पुष्पमादाय धर्मराजाय तत् तदा ॥ ८ ॥ उस समय मनोहर नेत्रप्रान्तवाली अनिन्द्य सुन्दरी (सती-साध्वी) द्रौपदी भीमसेनसे ऐसा कहकर और वह पुष्प लेकर धर्मराज युधिष्ठिरको देनेके लिये चली गयी ॥ ८ ॥ अभिप्रायं तु विज्ञाय महिष्याः पुरुषर्षभः । प्रियायाः प्रियकामः स प्रायाद् भीमो महाबलः ॥ ९ ॥ पुरुषशिरोमणि महाबली भीम अपनी प्यारी रानीके मनोभावको जानकर उसका प्रिय करनेकी इच्छासे वहाँसे चल दिये ॥ ९ ॥

वातं तमेवाभिमुखो यतस्तत् पुष्पमागतम् । आजिहीर्षुर्जगामाशु स पुष्पाण्यपराण्यपि ॥ १० ॥ वे उसी तरहके और भी फूल ले आनेकी अभिलाषासे तुरंत पूर्वोक्त वायुकी ओर मुख करके उसी ईशान कोणमें आगे बढ़े, जिधरसे वह फूल आया था ॥ १० ॥

रुक्मपृष्ठं धनुर्गृह्य शरांश्चाशीविषोपमान् । मृगराडिव संक्रुद्धः प्रभिन्न इव कुञ्जरः ॥ ११ ॥ उन्होंने हाथमें वह अपना धनुष ले लिया जिसके पृष्ठभागमें सुवर्ण जड़ा हुआ था। साथ ही विषधर सर्पोंके समान भयंकर बाण भी तरकसमें रख लिये। फिर क्रोधमें भरे हुए सिंह तथा मदकी धारा बहानेवाले मतवाले गजराजकी भाँति निर्भय होकर आगे बढ़े ॥ ११ ॥

ददृशुः सर्वभूतानि महाबाणधनुर्धरम् । न ग्लानिर्न च वैक्लव्यं न भयं न च सम्भ्रमः ॥ १२ ॥ कदाचिज्जुषते पार्थमात्मजं मातरिश्वनः । महान् धनुष-बाण लेकर जाते हुए भीमसेनको उस समय सब प्राणियोंने देखा। उन वायुपुत्र कुन्ती-कुमारको कभी ग्लानि, विकलता, भय अथवा घबराहट नहीं होती थी ॥ १२-१३ ॥

द्रौपद्याः प्रियमन्विच्छन् स बाहुबलमाश्रितः ॥ १३ ॥ व्यपेतभयसम्मोहः शैलमभ्यपतद् बली ।

स ते द्रुमलतागुल्मच्छन्नं नीलशिलातलम् ॥ १४ ॥ गिरिं चचारारिहरः किन्नराचरितं शुभम् । नानावर्णधरैश्चित्रं धातुद्रुममृगाण्डजैः ॥ १५ ॥ द्रौपदीका प्रिय करनेकी इच्छासे अपने बाहुबलका भरोसा करके भय और मोहसे रहित बलवान् भीमसेन सामनेके शैल-शिखरपर चढ़ गये। वह पर्वत वृक्षों, लताओं और झाड़ियोंसे आच्छादित था। उसकी शिलाएँ नीले रंगकी थीं। वहाँ किन्नरलोग भ्रमण करते थे। शत्रुसंहारी भीमसेन उस सुन्दर पर्वतपर विचरने लगे। बहुरंगे धातुओं, वृक्षों, मृगों और पक्षियोंसे उसकी विचित्र शोभा हो रही थी ॥ १३—१५ ॥ सर्वभूषणसम्पूर्णं भूमेर्भुजमिवोच्छ्रितम् । सर्वत्र रमणीयेषु गन्धमादनसानुषु ॥ १६ ॥ सक्तचक्षुरभिप्रायान् हृदयेनानुचिन्तयन् । पुंस्कोकिलनिनादेषु षट्पदाचरितेषु च ॥ १७ ॥ बद्धश्रोत्रमनश्चक्षुर्जगामामितविक्रमः । वह देखनेमें ऐसा जान पड़ता था मानो पृथिवीके समस्त आभूषणोंसे विभूषित ऊँचे उठी हुई भुजा हो। गन्धमादनके शिखर सब ओरसे रमणीय थे। वहाँ कोयल पक्षियोंकी शब्दध्वनि हो रही थी और झुंड-के-झुंड भौंरे मँडरा रहे थे। भीमसेन उन्हींमें आँखें गड़ाये मन-ही-मन अभिलषित कार्यका चिन्तन करते जाते थे। अमितपराक्रमी भीमके कान, नेत्र और मन उन्हीं शिखरोंमें अटके रहे अर्थात् उनके कान वहाँके विचित्र शब्दोंको सुननेमें लग गये; आँखें वहाँके अद्भुत दृश्योंको निहारने लगीं और मन वहाँकी अलौकिक विशेषताके विषयमें सोचने लगा और वे अपने गन्तव्य स्थानकी ओर अग्रसर होते चले गये ॥ १६-१७ १ ३ ॥ आजिघ्रन् स महातेजाः सर्वर्तुकुसुमोद्भवम् ॥ १८ ॥ गन्धमुद्धतमुद्दामो वने मत्त इव द्विपः । वीज्यमानः सुपुण्येन नानाकुसुमगन्धिना ॥ १९ ॥ पितुः संस्पर्शशीतेन गन्धमादनवायुना । ह्रियमाणश्रमः पित्रा सम्प्रहृष्टतनूरुहः ॥ २० ॥ वे महातेजस्वी कुन्तीकुमार सभी ऋतुओंके फूलोंके उत्कट सुगन्धका आस्वादन करते हुए वनमें उद्दामगतिसे विचरनेवाले मदोन्मत्त गजराजकी भाँति चले जा रहे थे। नाना प्रकारके कुसुमोंसे सुवासित गन्धमादनकी परम पवित्र वायु उन्हें पंखा झल रही थी। जैसे पिताको पुत्रका स्पर्श शीतल एवं सुखद जान पड़ता है, वैसा ही सुख भीमसेनको उस पर्वतीय वायुके स्पर्शसे मिल रहा था। उनके पिता पवनदेव उनकी सारी थकावट हर लेते थे। उस समय हर्षातिरेकसे भीमके शरीरमें रोमांच हो रहा था ॥ १८—२० ॥ स यक्षगन्धर्वसुरब्रह्मर्षिगणसेवितम् ।

विलोकयामास तदा पुष्पहेतोररिंदमः ॥ २१ ॥

शत्रुदमन भीमसेनने उस समय (पूर्वोक्त पुष्पकी प्राप्तिके लिये एक बार) यक्ष, गन्धर्व,

देवता और ब्रह्मर्षियोंसे सेवित उस विशाल पर्वतपर (सब ओर) दृष्टिपात किया ।। २१ ।।

विषमच्छदैरचितैरनुलिप्त इवाङ्गुलैः ।

वलिभिर्धातुविच्छेदैः काञ्चनाञ्जनराजतैः ।

सपक्षमिव नृत्यन्तं पार्श्वलग्नेः पयोधरैः ॥ २२ ॥

उस समय अनेक धातुओंसे रँगे हुए सप्तपर्ण (छितवन) के पत्तोंद्वारा उनके ललाटमें

विभिन्न धातुओंके काले, पीले और सफेद रंग लग गये थे, जिससे ऐसा जान पड़ता था

मानो अँगुलियोंद्वारा त्रिपुण्ड्र चन्दन लगाया गया हो। उस पर्वत-शिखरके उभय पार्श्वमें लगे

हुए मेघोंसे उसकी ऐसी शोभा हो रही थी मानो वह पुनः पंखधारी होकर नृत्य कर रहा

है ।। २२ ।।

मुक्ताहारैरिव चितं च्युतैः प्रस्रवणोदकैः ।

अभिरामदरीकुञ्जनिर्झरोदककन्दरम् ॥ २३ ॥

निरन्तर झरनेवाले झरनोंके जल उस पहाड़के कण्ठदेशमें अवलम्बित मोतियोंके हार-

से प्रतीत हो रहे थे। उस पर्वतकी गुफा, कुंज, निर्झर, सलिल और कन्दराएँ सभी मनोहर

थे ।। २३ ।।

अप्सरोनूपुररवैः प्रनृत्तवरबर्हिणम् ।

दिग्वारणविषाणाग्रैर्घृष्टोपलशिलातलम् ॥ २४ ॥

वहाँ अप्सराओंके नूपुरोंकी मधुर ध्वनिके साथ सुन्दर मोर नाच रहे थे। उस पर्वतके

एक-एक रत्न और शिलाखण्डपर दिग्गजोंके दाँतोंकी रगड़‌का चिह्न अंकित था ।। २४ ।।

स्रस्तांशुकमिवाक्षोभ्यैर्निम्नगा निःसृतैर्जलैः ।

सशष्पकवलैः स्वस्थैरदूरपरिवर्तिभिः ॥ २५ ॥

भयानभिज्ञैर्हरिणैः कौतूहलनिरीक्षितः ।

चालयन्नुरुवेगेन लताजालान्यनेकशः ॥ २६ ॥

आक्रीडमानो हृष्टात्मा श्रीमान् वायुसुतो ययौ ।

प्रियामनोरथं कर्तुमुद्यतश्चारुलोचनः ॥ २७ ॥

निम्नगामिनी नदियोंसे निकला हुआ क्षोभरहित जल नीचेकी ओर इस प्रकार बह रहा

था, मानो उस पर्वतका वस्त्र खिसककर गिरा जाता हो। भयसे अपरिचित और स्वस्थ

हरिण मुँहमें हरे घासका कौर लिये पास ही खड़े होकर भीमसेनकी ओर कौतूहलभरी

दृष्टिसे देख रहे थे। उस समय मनोहर नेत्रोंवाले शोभाशाली वायुपुत्र भीम अपने महान् वेगसे

अनेक लतासमूहोंको विचलित करते हुए हर्षपूर्ण हृदयसे खेल-सा करते जा रहे थे। वे

अपनी प्रिया द्रौपदीका प्रिय मनोरथ पूर्ण करनेको सर्वथा उद्यत थे ।। २५-२७ ।।

प्रांशुः कनकवर्णाभः सिंहसंहननो युवा ।

मत्तवारणविक्रान्तो मत्तवारणवेगवान् ॥ २८ ॥

उनकी कद बहुत ऊँची थी। शरीरका रंग स्वर्ण-सा दमक रहा था। उनके सम्पूर्ण अंग सिंहके समान सुदृढ़ थे। उन्होंने युवावस्थामें पदार्पण किया था। वे मतवाले हाथीके समान मस्तानी चालसे चलते थे। उनका वेग मदोन्मत्त गजराजके समान था ॥ २८ ॥

मत्तवारणताम्राक्षो मत्तवारणवारणः । प्रियपार्श्वोपविष्टाभिर्व्यावृत्ताभिर्विचेष्टितैः ॥ २९ ॥ यक्षगन्धर्वयोषाभिर्दृश्याभिर्निरीक्षितः । नवावतारो रूपस्य विक्रीडन्निव पाण्डवः ॥ ३० ॥ चचार रमणीयेषु गन्धमादनसानुषु । संस्मरन् विविधान् क्लेशान् दुर्योधनकृतान् बहून् ॥ ३१ ॥ द्रौपद्या वनवासिन्याः प्रियं कर्तुं समुद्यतः । सोऽचिन्तयद् गते स्वर्गमर्जुने मयि चागते ॥ ३२ ॥ पुष्पहेतोः कथं त्वार्यः करिष्यति युधिष्ठिरः । स्नेहान्नवरो नूनमविश्वासाद् बलस्य च ॥ ३३ ॥ नकुलं सहदेवं च न मोक्ष्यति युधिष्ठिरः । कथं तु कुसुमावाप्तिः स्याच्छीघ्रमिति चिन्तयन् ॥ ३४ ॥ प्रतस्थे नरशार्दूलः पक्षिराडिव वेगितः । सज्जमानमनोदृष्टिः फुल्लेषु गिरिसानुषु ॥ ३५ ॥

मतवाले हाथीके समान ही उनकी लाल-लाल आँखें थीं। वे समरभूमिमें मदोन्मत्त हाथियोंको भी पीछे हटानेमें समर्थ थे। अपने प्रियतमके पार्श्वभागमें बैठी हुई यक्ष और गन्धर्वोंकी युवतियाँ सब प्रकारकी चेष्टाओंसे निवृत्त हो स्वयं अलक्षित रहकर भीमसेनकी ओर देख रही थीं। वे उन्हें सौन्दर्यके नूतन अवतार-से प्रतीत होते थे। इस प्रकार पाण्डुनन्दन भीम गन्धमादनके रमणीय शिखरोंपर खेल-सा करते हुए विचरने लगे। वे दुर्योधनद्वारा दिये गये नाना प्रकारके असंख्य क्लेशोंका स्मरण करते हुए वनवासिनी द्रौपदीका प्रिय करनेके लिये उद्यत हुए थे। उन्होंने मन-ही-मन सोचा—'अर्जुन स्वर्गलोकमें चले गये हैं और मैं फूल लेनेके लिये इधर चला आया हूँ। ऐसी दशामें आर्य युधिष्ठिर कोई कार्य कैसे करेंगे? नरश्रेष्ठ महाराज युधिष्ठिर नकुल और सहदेवपर अत्यन्त स्नेह रखते हैं। उन दोनोंके बलपर उन्हें विश्वास नहीं है। अतः वे निश्चय ही उन्हें नहीं छोड़ेंगे, अर्थात् कहीं नहीं भेजेंगे। अब कैसे मुझे शीघ्र वह फूल प्राप्त हो जाय—यह चिन्ता करते हुए नरश्रेष्ठ भीम पक्षिराज गरुड़के समान वेगसे आगे बढ़े। उनके मन और नेत्र फूलोंसे भरे हुए पर्वतीय शिखरोंपर लगे हुए थे॥ २९—३५ ॥

द्रौपदीवाक्यपाथेयो भीमः शीघ्रतरं ययौ । कम्पयन् मेदिनीं पद्भ्यां निर्घात इव पर्वसु ॥ ३६ ॥

त्रासयन् गजयूथानि वातरंहा वृकोदरः ।

सिंहव्याघ्रमृगांश्चैव मर्दयानो महाबलः ॥ ३७ ॥

उन्मूलयन् महावृक्षान् पोथयंस्तरसा बली ।

लतावल्लीश्च वेगेन विकर्षन् पाण्डुनन्दनः ।

उपर्युपरि शैलाग्रमारुरुक्षुरिव द्विपः ॥ ३८ ॥

द्रौपदीका अनुरोधपूर्ण वचन ही उनका पाथेय (मार्गका कलेवा) था, वे उसीको लेकर

शीघ्रतापूर्वक चले जा रहे थे। वायुके समान वेगशाली वृकोदर पर्वकालमें होनेवाले उत्पात

(भूकम्प और बिजली गिरने)-के समान अपने पैरोंकी धमकसे पृथ्वीको कम्पित और

हाथियोंके समूहोंको आतंकित करते हुए चलने लगे। वे महाबली कुन्तीकुमार सिंहों, व्याघ्रों

और मृगोंको कुचलते तथा अपने वेगसे बड़े-बड़े वृक्षोंको जड़से उखाड़ते और विनाश करते

हुए आगे बढ़ने लगे। पाण्डुनन्दन भीम अपने वेगसे लताओं और बल्लरियोंको खींचे लिये

जाते थे। वे ऊपर-ऊपर जाते हुए ऐसे प्रतीत होते थे, मानो कोई गजराज पर्वतकी सबसे

ऊँची चोटीपर चढ़ना चाहता हो ॥ ३६—३८ ॥

विनर्दमानोऽतिभृशं सविद्युदिव तोयदः ।

तेन शब्देन महता भीमस्य प्रतिबोधिताः ॥ ३९ ॥

गुहां संतत्यजुर्व्याघ्रा निलिल्युर्वनवासिनः ।

समुत्पेतुः खगास्त्रस्ता मृगयूथानि दुद्रुवुः ॥ ४० ॥

वे बिजलियोंसे सुशोभित मेघकी भाँति बड़े जोरसे गर्जना करने लगे। भीमसेनकी उस

भयंकर गर्जनासे जगे हुए व्याघ्र अपनी गुफा छोड़कर भाग गये, वनवासी प्राणी वनमें ही

छिप गये, डरे हुए पक्षी आकाशमें उड़ गये और मृगोंके झुंड दूरतक भागते चले

गये ॥ ३९-४० ॥

ऋक्षाश्चोत्ससृजुर्वृक्षांस्तत्यजुर्हरयो गुहाम् ।

व्यजृम्भन्त महासिंहा महिषाश्चावलोकयन् ॥ ४१ ॥

रीछोंने वृक्षोंका आश्रय छोड़ दिया, सिंहोंने गुफाएँ त्याग दीं, बड़े-बड़े सिंह जँभाई लेने

लगे और जंगली भैंसे दूरसे ही उनकी ओर देखने लगे ॥ ४१ ॥

तेन वित्रासिता नागाः करेणुपरिवारिताः ।

तद् वनं स परित्यज्य जग्मुरन्यन्महावनम् ॥ ४२ ॥

भीमसेनकी उस गर्जनासे डरे हुए हाथी उस वनको छोड़कर हथिनियोंसे घिरे हुए दूसरे

विशाल वनमें चले गये ॥ ४२ ॥

वराहमृगसंघाश्च महिषाश्च वनेचराः ।

व्याघ्रगोमायुसंघाश्च प्रणेदुर्गवयैः सह ॥ ४३ ॥

रथाङ्गसाह्वदात्यूहा हंसकारण्डवप्लवाः ।

शुकाः पुंस्कोकिलाः क्रौञ्चा विसंज्ञा भेजिरे दिशः ॥ ४४ ॥

सूअर, मृगसमूह, जंगली भैंसे, बाघों तथा गीदड़ोंके समुदाय और गवय—ये सब-के-

सब एक साथ चीत्कार करने लगे। चक्रवाक, चातक, हंस, कारण्डव, प्लव, शुक, कोकिल

और क्रौंच आदि पक्षियोंने अचेत होकर भिन्न-भिन्न दिशाओंकी शरण ली ॥ ४३-४४ ॥

तथान्ये दर्पिता नागाः करेणुशरपीडिताः ।

सिंहव्याघ्राश्च संक्रुद्धा भीमसेनमथाद्रवन् ॥ ४५ ॥

शकृन्मूत्रं च मुञ्चाना भयविभ्रान्तमानसाः ।

व्यादितास्या महारौद्रा व्यनदन् भीषणान् रवान् ॥ ४६ ॥

तथा हथिनियोंके कटाक्ष-बाणसे पीड़ित हुए दूसरे बलोन्मत्त गजराज, सिंह और व्याघ्र

क्रोधमें भरकर भीमसेनपर टूट पड़े। वे मल-मूत्र छोड़ते हुए मन-ही-मन भयसे घबरा रहे थे

और मुँह बाये हुए अत्यन्त भयानक रूपसे भैरव-गर्जना कर रहे थे ॥ ४५-४६ ॥

ततो वायुसुतः क्रोधात् स्वबाहुबलमाश्रितः ।

गजेनान्यान गजाञ्छ्रीमान् सिंहं सिंहेन वा विभुः ॥ ४७ ॥

तलप्रहारैरन्यांश्च व्यहनत् पाण्डवो बली ।

ते वध्यमाना भीमेन सिंहव्याघ्रतरक्षवः ॥ ४८ ॥

भयाद् विससृजुर्भीमं शकृन्मूत्रं च सुस्रुवुः ।

प्रविवेश ततः क्षिप्रं तानपास्य महाबलः ॥ ४९ ॥

वनं पाण्डुसुतः श्रीमाञ्छब्देनापूरयन् दिशः ।

तब अपने बाहु-बलका भरोसा रखनेवाले श्रीमान् वायुपुत्र भीमने कुपित हो एक

हाथीसे दूसरे हाथियोंको और एक सिंहसे दूसरे सिंहोंको मार भगाया तथा उन महाबली

पाण्डुकुमारने कितनोंको तमाचोंके प्रहारसे मार डाला। भीमसेनकी मार खाकर सिंह, व्याघ्र

और चीते (बघेरे) भयसे उन्हें छोड़कर भाग चले तथा घबराकर मल-मूत्र करने लगे।

तदनन्तर महान् शक्तिशाली पाण्डुनन्दन भीमसेनने शीघ्र उन सबको छोड़कर अपनी

गर्जनासे सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजाते हुए एक वनमें प्रवेश किया ॥ ४७—४९ १/२ ॥

अथापश्यन्महाबाहुर्गन्धमादनसानुषु ॥ ५० ॥

सुरम्यं कदलीषण्डं बहुयोजनविस्तृतम् ।

तमभ्यगच्छद् वेगेन क्षोभयिष्यन् महाबलः ॥ ५१ ॥

महागज इवासावी प्रभञ्जन् विविधान् द्रुमान् ।

उत्पाट्य कदलीस्तम्भान् बहुतालसमुच्छ्रयान् ॥ ५२ ॥

चिक्षेप तरसा भीमः समन्ताद् बलिनां वरः ।

विनदन् सुमहातेजा नृसिंह इव दर्पितः ॥ ५३ ॥

ततः सत्त्वान्युपाक्रामद् बहूनि सुमहन्ति च ।

रुरुवानरसिंहांश्च महिषांश्च जलाशयान् ॥ ५४ ॥

तेन शब्देन चैवाथ भीमसेनरवेण च ।

वनान्तरगताश्चापि वित्रेसुर्मृगपक्षिणः ।। ५५ ।।

इसी समय गन्धमादनके शिखरोंपर महाबाहु भीमने एक परम सुन्दर केलेका बगीचा

देखा, जो कई योजन दूरतक फैला हुआ था। मदकी धारा बहानेवाले महाबली गजराजकी

भाँति उस कदलीवनमें हलचल मचाते और भाँति-भाँतिके वृक्षोंको तोड़ते हुए वे बड़े वेगसे

वहाँ गये। वहाँके केलेके वृक्ष खम्भोंके समान मोटे थे। उनकी ऊँचाई कई ताड़ोंके बराबर

थी। बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमने बड़े वेगसे उन्हें उखाड़-उखाड़कर सब ओर फेंकना आरम्भ

किया। वे महान् तेजस्वी तो थे ही, अपने बल और पराक्रमपर गर्व भी रखते थे; अतः

भगवान् नृसिंहकी भाँति विकट गर्जना करने लगे। तत्पश्चात् और भी बहुत-से बड़े-बड़े

जन्तुओंपर आक्रमण किया। रुरु, वानर, सिंह, भैंसे तथा जल-जन्तुओंपर भी धावा किया।

उन पशु-पक्षियोंके एवं भीमसेनके उस भयंकर शब्दसे दूसरे वनमें रहनेवाले मृग और पक्षी

भी थर्रा उठे ।। ५०-५५ ।।

तं शब्दं सहसा श्रुत्वा मृगपक्षिसमीरितम् ।

जलार्द्रपक्षा विहगाः समुत्पेतुः सहस्रशः ।। ५६ ।।

मृगों और पक्षियोंके उस भयसूचक शब्दको सहसा सुनकर सहस्रों पक्षी आकाशमें

उड़ने लगे। उन सबकी पाँखें जलसे भीगी हुई थीं ।। ५६ ।।

तानौदकान् पक्षिगणान् निरीक्ष्य भरतर्षभः ।

तानेवानुसरन् रम्यं ददर्श सुमहत् सरः ।। ५७ ।।

भरतश्रेष्ठ भीमने यह देखकर कि ये तो जलके पक्षी हैं, उन्हींके पीछे चलने लगे और

आगे जानेपर एक अत्यन्त रमणीय विशाल सरोवर देखा ।। ५७ ।।

काञ्चनैः कदलीषण्डैर्मन्दमारुतकम्पितैः ।

वीज्यमानमिवाक्षोभ्यं तीरात् तीरविसर्पिभिः ।। ५८ ।।

उस सरोवरके एक तीरसे लेकर दूसरे तीरतक फैले हुए सुवर्णमय केलेके वृक्ष मन्द

वायुसे विकम्पित होकर मानो उस अगाध जलाशयको पंखा झल रहे थे ।। ५८ ।।

तत् सरोऽथावतीर्याशु प्रभूतनलिनोत्पलम् ।

महागज इवोद्दामश्चिक्रीड बलवद् बली ।। ५९ ।।

उसमें प्रचुर कमल और उत्पल खिले हुए थे। बन्धनरहित महान् गजके समान

बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेन सहसा उस सरोवरमें उतरकर जल-क्रीड़ा करने लगे ।। ५९ ।।

विक्रीड्य तस्मिन् सुचिरमुत्ततारामितद्युतिः ।

ततोऽध्यगन्तुं वेगेन तद् वनं बहुपादपम् ।। ६० ।।

दीर्घ कालतक उस सरोवरमें क्रीड़ा करनेके पश्चात् अमित तेजस्वी भीम जलसे बाहर

निकले और असंख्य वृक्षोंसे सुशोभित उस कदलीवनमें वेगपूर्वक जानेको उद्यत

हुए ।। ६० ।।

दध्मौ च शङ्खं स्वनवत् सर्वप्राणेन पाण्डवः ।

आस्फोटयच्च बलवान् भीमः संनादयन् दिशः ॥ ६१ ॥ तस्य शङ्खस्य शब्देन भीमसेनरवेण च । बाहुशब्देन चोग्रेण नदन्तीव गिरेर्गुहाः ॥ ६२ ॥ उस समय बलवान् पाण्डुनन्दन भीमने अपनी सारी शक्ति लगाकर बड़े जोरसे शंख बजाया और सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए ताल ठोंका। उस शंखकी ध्वनि, भीमसेनकी गर्जना और उनके ताल ठोंकनेके भयंकर शब्दसे मानो पर्वतोंकी कन्दराएँ गूँज उठीं ॥ ६१-६२ ॥

तं वज्रनिष्पेषसममास्फोटितमहारवम् । श्रुत्वा शैलगुहासुप्तैः सिंहैर्मुक्तो महास्वनः ॥ ६३ ॥ पर्वतोंपर वज्रपात होनेके कारण उस ताल ठोंकनेके भयानक शब्दको सुनकर गुफाओंमें सोये हुए सिंहोंने भी जोर-जोरसे दहाड़ना आरम्भ किया ॥ ६३ ॥

सिंहनादभयत्रस्तैः कुञ्जरैरपि भारत । मुक्तो विरावः सुमहान् पर्वतो येन पूरितः ॥ ६४ ॥ भारत! उन सिंहोंका दहाड़ना सुनकर भयसे डरे हुए हाथी भी चीत्कार करने लगे, जिससे वह विशाल पर्वत शब्दायमान हो उठा ॥ ६४ ॥

तं तु नादं ततः श्रुत्वा मुक्तं वारणपुङ्गवैः । भ्रातरं भीमसेनं तु विज्ञाय हनुमान् कपिः ॥ ६५ ॥ बड़े-बड़े गजराजोंका वह चीत्कार सुनकर कपिप्रवर हनुमान्‌जी, जो उस समय कदलीवनमें ही रहते थे, यह समझ गये कि मेरे भाई भीमसेन इधर आये हैं ॥ ६५ ॥

दिवंगमं रुरोधाथ मार्गं भीमस्य कारणात् । अनेन हि पथा मा वै गच्छेदिति विचार्य सः ॥ ६६ ॥ आस्त एकायने मार्गे कदलीषण्डमण्डिते । भ्रातुर्भीमस्य रक्षार्थं तं मार्गमवरुध्य वै ॥ ६७ ॥ तब उन्होंने भीमसेनके हितके लिये स्वर्गकी ओर जानेवाला मार्ग रोक दिया। हनुमान्‌जीने यह सोचकर कि भीमसेन इसी मार्गसे स्वर्गलोककी ओर न चले जायँ, एक मनुष्यके आने-जाने योग्य उस संकुचित मार्गपर बैठ गये। वह मार्ग केलेके वृक्षोंसे घिरा होनेके कारण बड़ी शोभा पा रहा था। उन्होंने अपने भाई भीमकी रक्षाके लिये ही यह राह रोकी थी ॥ ६६-६७ ॥

मात्र प्राप्स्यति शापं वा धर्षणां वेति पाण्डवः । कदलीषण्डमध्यस्थो ह्येवं संचिन्त्य वानरः ॥ ६८ ॥ प्राजृम्भत महाकायो हनूमान् नाम वानरः । कदलीषण्डमध्यस्थो निद्रावशगतस्तदा ॥ ६९ ॥ जृम्भमाणः सुविपुलं शक्रध्वजमिवोच्छ्रितम् ।

आस्फोटयच्च लाङ्गूलमिन्द्राशनिसमस्वनम् ॥ ७० ॥ कदलीवनमें आय हुए पाण्डुनन्दन भीमसेनको इस मार्गपर आनेके कारण किसीसे शाप या तिरस्कार न प्राप्त हो जाय, यह विचारकर ही कपिप्रवर हनुमान्जी उस वनके भीतर स्वर्गका रास्ता रोककर सो गये। उस समय उन्होंने अपने शरीरको बड़ा कर लिया था। निद्राके वशीभूत होकर जब वे जँभाई लेते और इन्द्रकी ध्वजाके समान ऊँचे तथा विशाल लंगूरको फटकारते, उस समय वज्रकी गड़गड़ाहटके समान आवाज होती थी ॥ ६८—७० ॥

तस्य लाङ्गूलनिनदं पर्वतः सुगुहामुखैः । उद्गारमिव गौर्नर्दन्नुत्ससर्ज समन्ततः ॥ ७१ ॥ वह पर्वत उनकी पूँछकी फटकारके उस महान् शब्दको सुन्दर कन्दरारूपी मुखोंद्वारा सब ओर प्रतिध्वनिके रूपमें दोहराता था, मानो कोई साँड़ जोर-जोरसे गर्जना कर रहा हो ॥ ७१ ॥

लाङ्गूलास्फोटशब्दाच्च चलितः स महागिरिः । विघूर्णमानशिखरः समन्तात् पर्यशीर्यत ॥ ७२ ॥ स लाङ्गूलरवस्तस्य मत्तवारणनिःस्वनम् । अन्तर्धाय विचित्रेषु चचार गिरिसानुषु ॥ ७३ ॥ पूँछके फटकारनेकी आवाजसे वह महान् पर्वत हिल उठा। उसके शिखर झूमते-से जान पड़े और वह सब ओरसे टूट-फूटकर बिखरने लगा। वह शब्द मतवाले हाथीके चिग्घाड़नेकी आवाजको भी दबाकर विचित्र पर्वत-शिखरोंपर चारों ओर फैल गया ॥ ७२-७३ ॥

स भीमसेनस्तच्छ्रुत्वा सम्प्रहृष्टतनूरुहः । शब्दप्रभवमन्विच्छंश्चचार कदलीवनम् ॥ ७४ ॥ उसे सुनकर भीमसेनके रोंगटे खड़े हो गये और उसके कारणको ढूँढ़नेके लिये वे उस केलेके बगीचेमें घूमने लगे ॥ ७४ ॥

कदलीवनमध्यस्थमथ पीने शिलातले । ददर्श सुमहाबाहुर्वानराधिपतिं तदा ॥ ७५ ॥ उस समय विशाल भुजाओंवाले भीमसेनने कदलीवनके भीतर ही एक मोटे शिलाखण्डपर लेटे हुए वानरराज हनुमान्जीको देखा ॥ ७५ ॥

विद्युत्सम्पातदुष्प्रेक्षं विद्युत्सम्पातपिङ्गलम् । विद्युत्सम्पातनिनदं विद्युत्सम्पातचञ्चलम् ॥ ७६ ॥ विद्युत्पातके समान चकाचौंध पैदा करनेके कारण उनकी ओर देखना अत्यन्त कठिन हो रहा था। उनकी अंगकान्ति गिरती हुई बिजलीके समान पिंगल-वर्णकी थी। उनका

गर्जन-तर्जन वज्रपातकी गड़गड़ाहटके समान था। वे विद्युत्पातके सदृश चञ्चल प्रतीत होते थे॥ ७६ ॥ बाहुस्वस्तिकविन्यस्तपीनह्रस्वशिरोधरम् । स्कन्धभूयिष्ठकायत्वात् तनुमध्यकटीतटम् ॥ ७७ ॥ किंचिच्चाभुग्नशीर्षेण दीर्घरोमाञ्चितेन च । लाङ्गूलेनोर्ध्वगतिना ध्वजेनेव विराजितम् ॥ ७८ ॥ उनके कंधे चौड़े और पुष्ट थे। अतः उन्होंने बाँहके मूलभागको तकिया बनाकर उसीपर अपनी मोटी और छोटी ग्रीवाको रख छोड़ा था और उनके शरीरका मध्यभाग एवं कटिप्रदेश पतला था। उनकी लंबी पूँछका अग्रभाग कुछ मुड़ा हुआ था। उसकी रोमावलि घनी थी तथा वह पूँछ ऊपरकी ओर उठकर फहराती हुई ध्वजा-सी सुशोभित होती थी॥ ७७-७८ ॥ ह्रस्वौष्ठं ताम्रजिह्वास्यं रक्तकर्णं चलद्भ्रुवम् । विवृत्तदंष्ट्रादशनं शुक्लतीक्ष्णाग्रशोभितम् ॥ ७९ ॥ अपश्यद् वदनं तस्य रश्मिवन्तमिवोडुपम् । वदनाभ्यन्तरगतैः शुक्लैर्दन्तैरलंकृतम् ॥ ८० ॥ उनके ओठ छोटे थे। जीभ और मुखका रंग ताँबेके समान था। कान भी लाल रंगके ही थे और भौंहें चञ्चल हो रही थीं। उनके खुले हुए मुखमें श्वेत चमकते हुए दाँत और दाढ़ें अपने सफेद और तीखे अग्रभागके द्वारा अत्यन्त शोभा पा रही थीं। इन सबके कारण उनका मुख किरणोंसे प्रकाशित चन्द्रमाके समान दिखायी देता था। मुखके भीतरकी श्वेत दन्तावलि उसकी शोभा बढ़ानेके लिये आभूषणका काम दे रही थी॥ ७९-८० ॥ केसरोत्करसम्मिश्रमशोकानामिवाेत्करम् । हिरण्मयीनां मध्यस्थं कदलीनां महाद्युतिम् ॥ ८१ ॥ सुवर्णमय कदली-वृक्षोंके बीच विराजमान महातेजस्वी हनुमान्जी ऐसे जान पड़ते थे मानो केसरोंकी क्यारीमें अशोकपुष्पोंका गुच्छ रख दिया गया हो॥ ८१ ॥ दीप्यमानेन वपुषा स्वर्चिष्मन्तमिवानलम् । निरीक्षन्तममित्रघ्नं लोचनैर्मधुपिङ्गलैः ॥ ८२ ॥ वे शत्रुसूदन वानरवीर अपने कान्तिमान् शरीरसे प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ते थे और अपनी मधुके समान पीली आँखोंसे इधर-उधर देख रहे थे॥

तं वानरवरं धीमानतिकायं महाबलम् । स्वर्गपन्थानमावृत्य हिमवन्तमिव स्थितम् ॥ ८३ ॥ दृष्ट्वा चैनं महाबाहुरेकं तस्मिन् महावने । अथोपसृत्य तरसा विभीर्भीमस्ततो बली ॥ ८४ ॥ सिंहनादं चकारोग्रं वज्राशनिसमं बली । तेन शब्देन भीमस्य वित्रेसुर्मृगपक्षिणः ॥ ८५ ॥

परम बुद्धिमान् बलवान् महाबाहु भीमसेन उस महान् वनमें विशालकाय महाबली वानरराज हनुमान्जीको अकेले ही स्वर्गका मार्ग रोककर हिमालयके समान स्थित देख निर्भय होकर वेगपूर्वक उनके पास गये और वज्र-गर्जनाके समान भयंकर सिंहनाद करने लगे। भीमसेनके उस सिंहनादसे वहाँके मृग और पक्षी थर्रा उठे ॥ ८३—८५ ॥

हनूमांश्च महासत्त्व ईषदन्मील्य लोचने । दृष्ट्वा तमथ सावज्ञं लोचनैर्मधुपिङ्गलैः । स्मितेन चैनमासाद्य हनूमानिदमब्रवीत् ॥ ८६ ॥

तब महान् धैर्यशाली हनुमान्जीने आँखें कुछ खोलकर अपने मधुपिंगल नेत्रोंद्वारा अवहेलनापूर्वक उनकी ओर देखा और उन्हें निकट पाकर उनसे मुसकराते हुए इस प्रकार कहा ॥ ८६ ॥

हनूमानुवाच

किमर्थं सरुजस्तेऽहं सुखसुप्तः प्रबोधितः । ननु नाम त्वया कार्या दया भूतेषु जानता ॥ ८७ ॥ हनूमान्‌जी बोले—भाई! मैं तो रोगी हूँ और यहाँ सुखसे सो रहा था। तुमने क्यों मुझे जगा दिया? तुम समझदार हो। तुम्हें सब प्राणियोंपर दया करनी चाहिये ॥ ८७ ॥

वयं धर्मं न जानीमस्तिर्यग्योनिमुपाश्रिताः । नरास्तु बुद्धिसम्पन्ना दयां कुर्वन्ति जन्तुषु ॥ ८८ ॥ हमलोग तो पशुयोनिके प्राणी हैं, अतः धर्मकी बात नहीं जानते; परंतु मनुष्य बुद्धिमान् होते हैं, अतः वे सब जीवोंपर दया करते हैं ॥ ८८ ॥

क्रूरेषु कर्मसु कथं देहवाक्चित्तदूषिषु । धर्मघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः ॥ ८९ ॥ किंतु पता नहीं, तुम्हारे-जैसे बुद्धिमान्लोग धर्मका नाश करनेवाले तथा मन, वाणी और शरीरको भी दूषित कर देनेवाले क्रूर कर्मोंमें कैसे प्रवृत्त होते हैं? ॥ ८९ ॥

न त्वं धर्मं विजानासि बुधा नोपासितास्त्वया । अल्पबुद्धितया बाल्यादुत्सादयसि यन्मृगान् ॥ ९० ॥ तुम्हें धर्मका बिलकुल ज्ञान नहीं है। मालूम होता है, तुमने विद्वानोंकी सेवा नहीं की है। मन्दबुद्धि होनेके कारण अज्ञानवश तुम यहाँके मृगोंको कष्ट पहुँचाते हो ॥ ९० ॥

ब्रूहि कस्त्वं किमर्थं वा किमिदं वनमागतः । वर्जितं मानुषैर्भावैस्तथैव पुरुषैरपि ॥ ९१ ॥ बोलो तो, तुम कौन हो? इस वनमें तुम क्यों और किसलिये आये हो? यहाँ तो न कोई मानवीय भाव हैं और न मनुष्योंका ही प्रवेश है ॥ ९१ ॥

क्व च त्वयाद्य गन्तव्यं प्रब्रूहि पुरुषर्षभ । अतः परमगम्योऽयं पर्वतः सुदुरारुहः ॥ ९२ ॥ पुरुषश्रेष्ठ! ठीक-ठीक बतलाओ, तुम्हें आज इधर कहाँतक जाना है? यहाँसे आगे तो यह पर्वत अगम्य है। इसपर चढ़ना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है ॥ ९२ ॥

विना सिद्धगतिं वीर गतिरत्र न विद्यते । देवलोकस्य मार्गोऽयमगम्यो मानुषैः सदा ॥ ९३ ॥ वीर! सिद्ध पुरुषोंके सिवा और किसीकी यहाँ गति नहीं है। यह देवलोकका मार्ग है, जो मनुष्योंके लिये सदा अगम्य है ॥ ९३ ॥

कारुण्यात् त्वामहं वीर वारयामि निबोध मे । नातः परं त्वया शक्यं गन्तुमाश्वसिहि प्रभो ॥ ९४ ॥ वीरवर! मैं दयावश ही तुम्हें आगे जानेसे रोकता हूँ। मेरी बात सुनो। प्रभो! यहाँसे आगे तुम किसी प्रकार जा नहीं सकते। इसपर विश्वास करो ॥ ९४ ॥