महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 993, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंस ते द्रुमलतागुल्मच्छन्नं नीलशिलातलम् ॥ १४ ॥ गिरिं चचारारिहरः किन्नराचरितं शुभम् । नानावर्णधरैश्चित्रं धातुद्रुममृगाण्डजैः ॥ १५ ॥ द्रौपदीका प्रिय करनेकी इच्छासे अपने बाहुबलका भरोसा करके भय और मोहसे रहित बलवान् भीमसेन सामनेके शैल-शिखरपर चढ़ गये। वह पर्वत वृक्षों, लताओं और झाड़ियोंसे आच्छादित था। उसकी शिलाएँ नीले रंगकी थीं। वहाँ किन्नरलोग भ्रमण करते थे। शत्रुसंहारी भीमसेन उस सुन्दर पर्वतपर विचरने लगे। बहुरंगे धातुओं, वृक्षों, मृगों और पक्षियोंसे उसकी विचित्र शोभा हो रही थी ॥ १३—१५ ॥ सर्वभूषणसम्पूर्णं भूमेर्भुजमिवोच्छ्रितम् । सर्वत्र रमणीयेषु गन्धमादनसानुषु ॥ १६ ॥ सक्तचक्षुरभिप्रायान् हृदयेनानुचिन्तयन् । पुंस्कोकिलनिनादेषु षट्पदाचरितेषु च ॥ १७ ॥ बद्धश्रोत्रमनश्चक्षुर्जगामामितविक्रमः । वह देखनेमें ऐसा जान पड़ता था मानो पृथिवीके समस्त आभूषणोंसे विभूषित ऊँचे उठी हुई भुजा हो। गन्धमादनके शिखर सब ओरसे रमणीय थे। वहाँ कोयल पक्षियोंकी शब्दध्वनि हो रही थी और झुंड-के-झुंड भौंरे मँडरा रहे थे। भीमसेन उन्हींमें आँखें गड़ाये मन-ही-मन अभिलषित कार्यका चिन्तन करते जाते थे। अमितपराक्रमी भीमके कान, नेत्र और मन उन्हीं शिखरोंमें अटके रहे अर्थात् उनके कान वहाँके विचित्र शब्दोंको सुननेमें लग गये; आँखें वहाँके अद्भुत दृश्योंको निहारने लगीं और मन वहाँकी अलौकिक विशेषताके विषयमें सोचने लगा और वे अपने गन्तव्य स्थानकी ओर अग्रसर होते चले गये ॥ १६-१७ १ ३ ॥ आजिघ्रन् स महातेजाः सर्वर्तुकुसुमोद्भवम् ॥ १८ ॥ गन्धमुद्धतमुद्दामो वने मत्त इव द्विपः । वीज्यमानः सुपुण्येन नानाकुसुमगन्धिना ॥ १९ ॥ पितुः संस्पर्शशीतेन गन्धमादनवायुना । ह्रियमाणश्रमः पित्रा सम्प्रहृष्टतनूरुहः ॥ २० ॥ वे महातेजस्वी कुन्तीकुमार सभी ऋतुओंके फूलोंके उत्कट सुगन्धका आस्वादन करते हुए वनमें उद्दामगतिसे विचरनेवाले मदोन्मत्त गजराजकी भाँति चले जा रहे थे। नाना प्रकारके कुसुमोंसे सुवासित गन्धमादनकी परम पवित्र वायु उन्हें पंखा झल रही थी। जैसे पिताको पुत्रका स्पर्श शीतल एवं सुखद जान पड़ता है, वैसा ही सुख भीमसेनको उस पर्वतीय वायुके स्पर्शसे मिल रहा था। उनके पिता पवनदेव उनकी सारी थकावट हर लेते थे। उस समय हर्षातिरेकसे भीमके शरीरमें रोमांच हो रहा था ॥ १८—२० ॥ स यक्षगन्धर्वसुरब्रह्मर्षिगणसेवितम् ।