महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 992, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंवातं तमेवाभिमुखो यतस्तत् पुष्पमागतम् । आजिहीर्षुर्जगामाशु स पुष्पाण्यपराण्यपि ॥ १० ॥ वे उसी तरहके और भी फूल ले आनेकी अभिलाषासे तुरंत पूर्वोक्त वायुकी ओर मुख करके उसी ईशान कोणमें आगे बढ़े, जिधरसे वह फूल आया था ॥ १० ॥
रुक्मपृष्ठं धनुर्गृह्य शरांश्चाशीविषोपमान् । मृगराडिव संक्रुद्धः प्रभिन्न इव कुञ्जरः ॥ ११ ॥ उन्होंने हाथमें वह अपना धनुष ले लिया जिसके पृष्ठभागमें सुवर्ण जड़ा हुआ था। साथ ही विषधर सर्पोंके समान भयंकर बाण भी तरकसमें रख लिये। फिर क्रोधमें भरे हुए सिंह तथा मदकी धारा बहानेवाले मतवाले गजराजकी भाँति निर्भय होकर आगे बढ़े ॥ ११ ॥
ददृशुः सर्वभूतानि महाबाणधनुर्धरम् । न ग्लानिर्न च वैक्लव्यं न भयं न च सम्भ्रमः ॥ १२ ॥ कदाचिज्जुषते पार्थमात्मजं मातरिश्वनः । महान् धनुष-बाण लेकर जाते हुए भीमसेनको उस समय सब प्राणियोंने देखा। उन वायुपुत्र कुन्ती-कुमारको कभी ग्लानि, विकलता, भय अथवा घबराहट नहीं होती थी ॥ १२-१३ ॥
द्रौपद्याः प्रियमन्विच्छन् स बाहुबलमाश्रितः ॥ १३ ॥ व्यपेतभयसम्मोहः शैलमभ्यपतद् बली ।