भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 991, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 991

सहस्रपत्रमर्काभं दिव्यं पद्ममुपाहरत् ॥ २ ॥ तदनन्तर ईशानकोणकी ओरसे अकस्मात् वायु चली। उसने सूर्यके समान तेजस्वी एक दिव्य सहस्रदल कमल लाकर वहाँ डाल दिया ॥ २ ॥ तदवैक्षत पाञ्चाली दिव्यगन्धं मनोरमम् । अनिलेनाहृतं भूमौ पतितं जलजं शुचि ॥ ३ ॥ तच्छुभा शुभमासाद्य सौगन्धिकमनुत्तमम् । अतीव मुदिता राजन् भीमसेनमथाब्रवीत् ॥ ४ ॥ जनमेजय! वह कमल बड़ा मनोरम था, उससे दिव्य सुगन्ध फैल रही थी। शुभलक्षणा द्रौपदीने उसे देखा और वायुके द्वारा लाकर पृथ्वीपर डाले हुए उस पवित्र, शुभ एवं परम उत्तम सौगन्धिक कमलके पास पहुँचकर अत्यन्त प्रसन्न हो भीमसेनसे इस प्रकार कहा — ॥ ३-४ ॥ पश्य दिव्यं सुरुचिरं भीम पुष्पमनुत्तमम् । गन्धसंस्थानसम्पन्नं मनसो मम नन्दनम् ॥ ५ ॥ इदं च धर्मराजाय प्रदास्यामि परंतप । हरेदं मम कामाय काम्यके पुनराश्रमे ॥ ६ ॥ ‘भीम! देखो तो, यह दिव्य पुष्प कितना अच्छा और कैसा सुन्दर है! मानो सुगन्ध ही इसका स्वरूप है। यह मेरे मनको आनन्द प्रदान कर रहा है। परंतप! मैं इसे धर्मराजको भेंट करूँगी। तुम मेरी इच्छाकी पूर्तिके लिये काम्यकवनके आश्रममें इसे ले चलो’ ॥ ५-६ ॥ यदि तेऽहं प्रिया पार्थ बहूनीमान्युपाहर । तान्यहं नेतुमिच्छामि काम्यकं पुनराश्रमम् ॥ ७ ॥ ‘कुन्तीनन्दन! यदि मेरे ऊपर तुम्हारा (विशेष) प्रेम है, तो मेरे लिये ऐसे ही बहुत-से फूल ले आओ। मैं इन्हें काम्यक वनमें अपने आश्रमपर ले चलना चाहती हूँ’ ॥ ७ ॥ एवमुक्त्वा शुभापाङ्गी भीमसेनमनिन्दिता । जगाम पुष्पमादाय धर्मराजाय तत् तदा ॥ ८ ॥ उस समय मनोहर नेत्रप्रान्तवाली अनिन्द्य सुन्दरी (सती-साध्वी) द्रौपदी भीमसेनसे ऐसा कहकर और वह पुष्प लेकर धर्मराज युधिष्ठिरको देनेके लिये चली गयी ॥ ८ ॥ अभिप्रायं तु विज्ञाय महिष्याः पुरुषर्षभः । प्रियायाः प्रियकामः स प्रायाद् भीमो महाबलः ॥ ९ ॥ पुरुषशिरोमणि महाबली भीम अपनी प्यारी रानीके मनोभावको जानकर उसका प्रिय करनेकी इच्छासे वहाँसे चल दिये ॥ ९ ॥