महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1000, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर उन्होंने निद्राविजयी वीर धनंजयको उन समस्त महामना वीर सेनापतियोंका भी अधिपति बना दिया ।। १४ १/२ ।। अर्जुनस्यापि नेता च संयन्ता चैव वाजिनाम् ।। १५ ।। संकर्षणानुजः श्रीमान् महाबुद्धिर्जनार्दनः । अर्जुनके भी नेता और उनके घोड़ोंके भी नियन्ता हुए बलरामजीके छोटे भाई परम बुद्धिमान् श्रीमान् भगवान् श्रीकृष्ण ।। १५ १/२ ।। तद् दृष्ट्वोपस्थितं युद्धं समासन्नं महात्ययम् ।। १६ ।। प्राविशद् भवनं राजन् पाण्डवानां हलायुधः । सहाक्रूरप्रभृतिभिर्गदसाम्बोद्धवादिभिः ।। १७ ।। रौक्मिणेयाहुकसुतैश्चारुदेष्णपुरोगमैः । वृष्णिमुख्यैरधिगतैर्व्याघ्रैरिव बलोत्कटैः ।। १८ ।। अभिगुप्तो महाबाहुर्मरुद्भिरिव वासवः । नीलकौशेयवसनः कैलासशिखरोपमः ।। १९ ।। सिंहखेलगतिः श्रीमान् मदरक्तान्तलोचनः । राजन्! तदनन्तर उस महान् संहारकारी युद्धको अत्यन्त संनिकट और प्रायः उपस्थित हुआ देख नीले रंगका रेशमी वस्त्र पहने कैलासशिखरके समान गौर-वर्णवाले हलधारी महाबाहु श्रीमान् बलरामजीने पाण्डवोंके शिविरमें सिंहके समान लीलापूर्वक गतिसे प्रवेश किया। उनके नेत्रोंके कोने मदसे अरुण हो रहे थे। उनके साथ अक्रूर आदि यदुवंशी तथा गद, साम्ब, उद्धव, प्रद्युम्न, चारुदेष्ण तथा आहुकपुत्र आदि प्रमुख वृष्णिवंशी भी जो सिंह और व्याघ्रोंके समान अत्यन्त उत्कट बल-शाली थे, उन सबसे सुरक्षित बलरामजी वैसे ही सुशोभित हुए, मानो मरुद्गणोंके साथ महेन्द्र शोभा पा रहे हों ।। तं दृष्ट्वा धर्मराजश्च केशवश्च महाद्युतिः ।। २० ।। उदतिष्ठत् ततः पार्थो भीमकर्मा वृकोदरः । गाण्डीवधन्वा ये चान्ये राजानस्तत्र केचन ।। २१ ।। उन्हें देखते ही धर्मराज युधिष्ठिर, महातेजस्वी श्रीकृष्ण, भयंकर कर्म करनेवाले कुन्तीपुत्र भीमसेन तथा अन्य जो कोई भी राजा वहाँ विद्यमान थे, वे सब-के-सब उठकर खड़े हो गये ।। २०-२१ ।। पूजयांचक्रिरे ते वै समायान्तं हलायुधम् । ततस्तं पाण्डवो राजा करे पस्पर्श पाणिना ।। २२ ।। हलायुध बलरामजीको आया देख सबने उनका समादर किया। तदनन्तर पाण्डुनन्दन राजा युधिष्ठिरने अपने हाथसे उनके हाथका स्पर्श किया ।। २२ ।। वासुदेवपुरोगास्तं सर्व एवाभ्यवादयन् । विराटद्रुपदौ वृद्धावभिवाद्य हलायुधः ।। २३ ।।