महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 999, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंसान्त्वनापूर्वक इस प्रकार कहा— ।। ६ १/२ ।। पर्याक्रामत सैन्यानि यत्तास्तिष्ठत दंशिताः ॥ ७ ॥ पितामहेन वो युद्धं पूर्वमेव भविष्यति । तस्मात् सप्तसु सेनासु प्रणेतॄन् मम पश्यत ॥ ८ ॥ 'तुम सब लोग सब ओर घूम-फिरकर अपनी सेनाओंका निरीक्षण करो और कवच आदिसे सुसज्जित होकर खड़े हो जाओ। सबसे पहले पितामह भीष्मसे तुम्हारा युद्ध होगा। इसलिये अपनी सात अक्षौहिणी सेनाओंके सेनापतियोंकी देखभाल कर लो' ॥ ७-८ ॥
कृष्ण उवाच
यथार्हति भवान् वक्तुमस्मिन् काले ह्युपस्थिते । तथेदमर्थवद् वाक्यमुक्तं ते भरतर्षभ ॥ ९ ॥ **भगवान् श्रीकृष्ण बोले—**भरतकुलभूषण! ऐसा अवसर उपस्थित होनेपर आपको जैसी बात कहनी चाहिये, वैसी ही यह अर्थयुक्त बात आपने कही है ॥ ९ ॥ रोचते मे महाबाहो क्रियतां यदनन्तरम् । नायकास्तव सेनायां क्रियन्तामिह सप्त वै ॥ १० ॥ महाबाहो! मुझे आपकी बात ठीक लगती है; अतः इस समय जो आवश्यक कर्तव्य है, उसका पालन कीजिये। अपनी सेनाके सात सेनापतियोंको यहाँ निश्चित कर लीजिये ॥ १० ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो द्रुपदमानाय्य विराटं शिनिपुङ्गवम् । धृष्टद्युम्नं च पाञ्चाल्यं धृष्टकेतुं च पार्थिव ॥ ११ ॥ शिखण्डिनं च पाञ्चाल्यं सहदेवं च मागधम् । एतान् सप्त महाभागान् वीरान् युद्धाभिकाङ्क्षिणः ॥ १२ ॥ सेनाप्रणेतॄन् विधिवदभ्यषिञ्चद् युधिष्ठिरः । सर्वसेनापतिं चात्र धृष्टद्युम्नं चकार ह ॥ १३ ॥ द्रोणान्तहेतोरुत्पन्नो य इद्धाज्जातवेदसः । **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर राजा द्रुपद, विराट, सात्यकि, पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न, धृष्टकेतु, पांचालवीर शिखण्डी और मगधराज सहदेव—इन सात युद्धाभिलाषी महाभाग वीरोंको युधिष्ठिरने विधिपूर्वक सेनापतिके पदपर अभिषिक्त कर दिया और धृष्टद्युम्नको सम्पूर्ण सेनाओंका प्रधान सेनापति बना दिया, जो द्रोणाचार्यका अन्त करनेके लिये प्रज्वलित अग्निसे उत्पन्न हुए थे ॥ ११—१३ १/२ ॥ सर्वेषामेव तेषां तु समस्तानां महात्मनाम् ॥ १४ ॥ सेनापतिपतिं चक्रे गुडाकेशं धनंजयम् ।