महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1022, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंसभामध्ये च यद् रूपं मायया कृतवानसि । तत् तथैव पुनः कृत्वा सार्जुनो मामभिद्रव ॥ ५४ ॥ 'तुमने सभामें मायाद्वारा जो विकट रूप बना लिया था; उसे पुनः उसी रूपमें प्रकट करके अर्जुनके साथ मुझपर धावा बोल दो ॥ ५४ ॥ इन्द्रजालं च माया वै कुहका वापि भीषणा । आत्तशस्त्रस्य संग्रामे वहन्ति प्रतिगर्जनाः ॥ ५५ ॥ 'इन्द्रजाल, माया अथवा भयानक कृत्या—ये युद्धमें हथियार उठाये हुए शूरवीरके क्रोध एवं सिंहनादको और भी बढ़ा देती हैं (उसे डरा नहीं सकतीं) ॥ ५५ ॥ वयमप्युत्सहेम द्यां खं च गच्छेम मायया । रसातलं विशामोऽपि ऐन्द्रं वा पुरमेव तु ॥ ५६ ॥ 'हम भी मायासे आकाशमें उड़ सकते हैं, अन्तरिक्षमें जा सकते हैं तथा रसातल या इन्द्रपुरीमें भी प्रवेश कर सकते हैं ॥ ५६ ॥ दर्शयेम च रूपाणि स्वशरीरे बहून्यपि । न तु पर्यायतः सिद्धिर्बुद्धिमाप्नोति मानुषीम् ॥ ५७ ॥ 'इतना ही नहीं, हम अपने शरीरमें बहुत-से रूप भी प्रकट करके दिखा सकते हैं; परंतु इन सब प्रदर्शनोंसे न तो अपने अभीष्टकी सिद्धि होती है और न अपना शत्रु ही मानवीय बुद्धि अर्थात् भयको प्राप्त हो सकता है ॥ ५७ ॥ मनसैव हि भूतानि धातैव कुरुते वशे । यद् ब्रवीषि च वार्ष्णेय धार्तराष्ट्रानहं रणे ॥ ५८ ॥ घातयित्वा प्रदास्यामि पार्थेभ्यो राज्यमुत्तमम् । आचचक्षे च मे सर्वं संजयस्तव भाषितम् ॥ ५९ ॥ 'एकमात्र विधाता ही अपने मानसिक संकल्पमात्रसे समस्त प्राणियोंको वशमें कर लेता है। वार्ष्णेय! तुम जो यह कहा करते थे कि मैं युद्धमें धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंको मरवाकर उनका सारा उत्तम राज्य कुन्तीके पुत्रोंको दे दूँगा। तुम्हारा वह सारा भाषण संजयने मुझे सुना दिया था ॥ ५८-५९ ॥ मद्द्वितीयेन पार्थेन वैरं वः सव्यसाचिना । स सत्यसंगरो भूत्वा पाण्डवार्थे पराक्रमी ॥ ६० ॥ 'तुमने यह भी कहा था कि 'कौरवो! मैं जिनका सहायक हूँ, उन्हीं सव्यसाची अर्जुनके साथ तुम्हारा वैर बढ़ रहा है, इत्यादि। अतः अब सत्यप्रतिज्ञ होकर पाण्डवोंके लिये पराक्रमी बनो ॥ ६० ॥ युध्यस्वाद्य रणे यत्तः पश्यामः पुरुषो भव । यस्तु शत्रुमभिज्ञाय शुद्धं पौरुषमास्थितः ॥ ६१ ॥ करोति द्विषतां शोकं स जीवति सुजीवितम् ।