महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1023, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें'युद्धमें अब प्रयत्नपूर्वक डट जाओ। हम तुम्हारी राह देखते हैं। अपने पुरुषत्वका परिचय दो। जो पुरुष शत्रुको अच्छी तरह समझ-बूझकर विशुद्ध पुरुषार्थका आश्रय ले शत्रुओंको शोकमग्न कर देता है, वही श्रेष्ठ जीवन व्यतीत करता है।। ६१ ½ ।। अकस्माच्चैव ते कृष्ण ख्यातं लोके महद् यशः ।। ६२ ।। अद्येदानीं विजानीमः सन्ति षण्ढाः सशृङ्गकाः । 'श्रीकृष्ण! मैं देखता हूँ संसारमें अकस्मात् ही तुम्हारा महान् यश फैल गया है; परंतु अब इस समय हमें मालूम हुआ है कि जो लोग तुम्हारे पूजक हैं, वे वास्तवमें पुरुषत्वका चिह्न धारण करनेवाले हिजड़े ही हैं ।। ६२ ½ ।। मद्विधो नापि नृपतिस्त्वयि युक्तः कथञ्चन ।। ६३ ।। संनाहं संयुगे कर्तुं कंसभृत्ये विशेषतः । 'मेरे-जैसे राजाको तुम्हारे साथ, विशेषतः कंसके एक सेवकके साथ लड़नेके लिये कवच धारण करके युद्धभूमिमें उतरना किसी तरह उचित नहीं है' ।। ६३ ½ ।। तं च तूबरकं बालं बह्वाशिनमविद्यकम् ।। ६४ ।। उलूक मद्द्वचो ब्रूहि असकृद्भीमसेनकम् । विराटनगरे पार्थ यस्त्वं सूदो ह्यभूः पुरा ।। ६५ ।। बल्लवो नाम विख्यातस्तन्ममैव हि पौरुषम् । 'उलूक! उस बिना मूँछोंके मर्द (अथवा बोझ ढोनेवाले बैल), अधिक खानेवाले, अज्ञानी और मूर्ख भीमसेनसे भी बारंबार मेरा यह संदेश कहना 'कुन्तीकुमार! पहले विराटनगरमें जो तू रसोइया बनकर रहा और बल्लवके नामसे विख्यात हुआ, वह सब मेरा ही पुरुषार्थ था ।। ६४-६५ ½ ।। प्रतिज्ञातं भामध्ये न तन्मिथ्या त्वया पुरा ।। ६६ ।। दुःशासनस्य रुधिरं पीयतां यदि शक्यते । 'पहले कौरवभामें तूने जो प्रतिज्ञा की थी, वह मिथ्या नहीं होनी चाहिये। यदि तुझमें शक्ति हो तो आकर दुःशासनका रक्त पी लेना ।। ६६ ।। यद् ब्रवीमि च कौन्तेय धार्तराष्ट्रानहं रणे ।। ६७ ।। निहनिष्यामि तरसा तस्य कालोऽयमागतः । 'कुन्तीकुमार! तुम जो कहा करते हो कि मैं युद्धमें धृतराष्ट्रके पुत्रोंको वेगपूर्वक मार डालूँगा, उसका यह समय आ गया है ।। ६७ ½ ।। त्वं हि भाज्ये पुरस्कार्यो भक्ष्ये पेये च भारत ।। ६८ ।। क्व युद्धं क्व च भोक्तव्यं युध्यस्व पुरुषो भव । 'भारत! तुम निरे भोजनभट्ट हो। अतः अधिक खाने-पीनेमें पुरस्कार पानेके योग्य हो। किंतु कहाँ युद्ध और कहाँ भोजन? शक्ति हो तो युद्ध करो और मर्द बनो ।। ६८ ½ ।। शयिष्यसे हतो भूमौ गदामालिङ्ग्य भारत ।। ६९ ।।