महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1035, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंहो? ।। १३-१४ ।। ब्राह्मे धनुषि चाचार्यं वेदयोरन्तगं द्वयोः । युधि धुर्यमविक्षोभ्यमनीकचरमच्युतम् ।। १५ ।। द्रोणं महाद्युतिं पार्थ जेतुमिच्छसि तन्मृषा । न हि शुश्रुम वातेन मेरुमुन्मथितं गिरिम् ।। १६ ।। ‘आचार्य द्रोण ब्राह्मवेद और धनुर्वेद दोनोंके पारंगत पण्डित हैं। वे युद्धका भार वहन करनेमें समर्थ, अक्षोभ्य, सेनाके मध्यमें विचरनेवाले तथा संग्रामभूमिसे कभी पीछे न हटनेवाले हैं। पार्थ! तुम उन्हीं महातेजस्वी द्रोणको जो जीतनेकी इच्छा करते हो, वह व्यर्थ दुःसाहस-मात्र है। वायुने कभी सुमेरु पर्वतको उखाड़ फेंका हो, यह कभी हमारे सुननेमें नहीं आया ।। १५-१६ ।। अनिलो वा वहेन्मेरुं द्यौर्वापि निपतेन्महीम् । युगं वा परिवर्तेत यद्येवं स्याद् यथाऽऽत्थ माम् ।। १७ ।। ‘तुम जैसा मुझसे कहते हो, वैसा ही यदि सम्भव हो जाय, तब तो वायु भी सुमेरु पर्वतको उठा ले, स्वर्गलोक पृथ्वीपर गिर पड़े अथवा युग ही बदल जाय ।। १७ ।। को ह्यस्ति जीविताकाङ्क्षी प्राप्येममरिमर्दनम् । गजो वाजी रथो वापि पुनः स्वस्ति गृहान् व्रजेत् ।। १८ ।। ‘जीवित रहनेकी इच्छावाला कौन ऐसा हाथीसवार, घुड़सवार अथवा रथी है, जो इन शत्रुमर्दन द्रोणसे भिड़कर कुशलपूर्वक अपने घरको लौट सके? ।। १८ ।। कथमाभ्यामभिध्यातः संस्पृष्टो दारुणेन वा । रणे जीवन् विमुच्येत पदा भूमिमुपस्पृशन् ।। १९ ।। ‘भीष्म और द्रोणने जिसे मारनेका निश्चय कर लिया हो अथवा जो युद्धमें इनके भयंकर अस्त्रोंसे छू गया हो, ऐसा कौन भूतलनिवासी जीवित बच सकता है? ।। १९ ।। किं दर्दुरः कूपशयो यथेमां न बुध्यसे राजचमूं समेताम् । दुराधर्षां देवचमूप्रकाशां गुप्तां नरेन्द्रैस्त्रिदशैरिव द्याम् ।। २० ।। प्राच्यैः प्रतीच्यैरथ दाक्षिणात्यै- रुदीच्यकाम्बोजशकैः खशैश्च । शाल्वैः समत्स्यैः कुरुमुख्यदेश्यै- म्लेच्छैः पुलिन्दैर्द्रविडान्ध्रकाञ्च्यैः ।। २१ ।। ‘जैसे देवता स्वर्गकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तर दिशाओंके नरेश तथा काम्बोज, शक, खश, शाल्व, मत्स्य, कुरु और मध्यप्रदेशके सैनिक एवं म्लेच्छ, पुलिन्द, द्रविड़, आन्ध्र और कांचीदेशीय योद्धा जिस सेनाकी रक्षा करते हैं, जो