महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंये सभी महामना पाण्डव शालवृक्षके स्तम्भोंके समान ऊँचे हैं। उनकी ऊँचाईका मान अन्य पुरुषोंसे एक बित्ता अधिक है ।। ७ १/२ ।।
सिंहसंहननाः सर्वे पाण्डुपुत्रा महाबलाः ।। ८ ।।
चरितब्रह्मचर्याश्च सर्वे तात तपस्विनः ।
ह्रीमन्तः पुरुषव्याघ्रा व्याघ्रा इव बलोत्कटाः ।। ९ ।।
सभी पाण्डव सिंहके समान सुगठित शरीरवाले और महान् बलवान् हैं। तात! उन सबने ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया है, पुरुषोंमें सिंहके समान पराक्रमी पाण्डव तपस्वी, लज्जाशील और व्याघ्रके समान उत्कट बलशाली हैं ।। ८-९ ।।
जवे प्रहारे सम्मर्दे सर्व एवातिमानुषाः ।
सर्वैर्जिता महीपाला दिग्जये भरतर्षभ ।। १० ।।
भरतश्रेष्ठ! वे वेग, प्रहार और संघर्षमें अमानुषिक शक्तिसे सम्पन्न हैं। उन सबने दिग्विजयके समय बहुत-से राजाओंपर विजय पायी है ।। १० ।।
न चैषां पुरुषाः केचिदायुधानि गदाः शरान् ।
विषहन्ति सदा कर्तुमधिज्यान्यपि कौरव ।। ११ ।।
उद्यन्तुं वा गदा गुर्वीः शरान् वा क्षेप्तुमाहवे ।
जवे लक्ष्यस्य हरणे भोज्ये पांसुविकर्षणे ।। १२ ।।
बालैरपि भवन्तस्तैः सर्व एव विशेषिताः ।
कुरुनन्दन! इनके आयुधों, गदाओं और बाणोंका आघात कोई भी नहीं सह सकते हैं। इसके सिवा न तो कोई इनके धनुषपर प्रत्यंचा ही चढ़ा पाते हैं, न युद्धमें इनकी भारी गदाको ही उठा सकते हैं और न इनके बाणोंका ही प्रयोग कर सकते हैं। वेगसे चलने, लक्ष्य-भेद करने, खाने-पीने तथा धूलि-क्रीड़ा करने आदिमें उन सबने बाल्यावस्थामें भी तुम्हें पराजित कर दिया था ।। ११-१२ १/२ ।।
एतत् सैन्यं समासाद्य सर्व एव बलोत्कटाः ।। १३ ।।
विध्वंसयिष्यन्ति रणे मा स्म तैः सह सङ्गमः ।
इस सेनामें आकर वे सभी उत्कट बलशाली हो गये हैं। युद्धमें आनेपर वे तुम्हारी सेनाका विध्वंस कर डालेंगे। मैं चाहता हूँ उनसे कहीं भी तुम्हारी मुठभेड़ न हो ।।
एकैकशस्ते सम्मर्दे हन्युः सर्वान् महीक्षितः ।। १४ ।।
प्रत्यक्षं तव राजेन्द्र राजसूये यथाभवत् ।
उनमेंसे एक-एकमें इतनी शक्ति है कि वे समस्त राजाओंका युद्धमें संहार कर सकते हैं। राजेन्द्र! राजसूय-यज्ञमें जैसा जो कुछ हुआ था, वह सब तुमने अपनी आँखों देखा था ।। १४ १/२ ।।
द्रौपद्याश्च परिक्लेशं द्यूते च परुषा गिरः ।। १५ ।।
ते स्मरन्तश्च संग्रामे चरिष्यन्ति च रुद्रवत् ।