महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1086, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंये बलवान्, सत्यपराक्रमी, महाबाहु अर्जुन क्रोधमें आकर तुम्हारी सेनाका संहार करेंगे और अपनी सेनाकी रक्षामें संलग्न रहेंगे ।। २३ १/२ ।। अहं चैनं प्रत्युदियामाचार्यो वा धनंजयम् ।। २४ ।। न तृतीयोऽस्ति राजेन्द्र सेनयोरुभयोरपि । य एनं शरवर्षाणि वर्षन्तमुदियाद् रथी ।। २५ ।। मैं अथवा द्रोणाचार्य ही धनंजयका सामना कर सकते हैं। राजेन्द्र! दोनों सेनाओंमें तीसरा कोई ऐसा रथी नहीं है, जो बाणोंकी वर्षा करते हुए अर्जुनके सामने जा सके ।। २४-२५ ।। जीमूत एव घर्मान्ते महावातसमीरितः । समायुक्तस्तु कौन्तेयो वासुदेवसहायवान् । तरुणश्च कृती चैव जीर्णावावामुभावपि ।। २६ ।। ग्रीष्म-ऋतुके अन्तमें प्रचण्ड वायुसे प्रेरित महामेघकी भाँति श्रीकृष्णसहित अर्जुन युद्धके लिये तैयार है। वह अस्त्रोंका विद्वान् और तरुण भी है। इधर हम दोनों वृद्ध हो चले हैं ।। २६ ।।
वैशम्पायन उवाच एतच्छ्रुत्वा तु भीष्मस्य राज्ञां दध्वंसिरे तदा । काञ्चनाङ्गदिनः पीना भुजाश्चन्दनरूषिताः ।। २७ ।। मनोभिः सह संवेगैः संस्मृत्य च पुरातनम् । सामर्थ्यं पाण्डवेयानां यथा प्रत्यक्षदर्शनात् ।। २८ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भीष्मकी यह बात सुनकर पाण्डवोंके पुरातन बल-पराक्रमको प्रत्यक्ष देखनेकी भाँति स्मरण करके राजाओंकी सुवर्णमय भुजबंदोंसे विभूषित चन्दनचर्चित स्थूल भुजाएँ एवं मन भी आवेगयुक्त होकर शिथिल हो गये ।। २७-२८ ।।
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि रथातिरथसंख्यानपर्वणि पाण्डवरथातिरथसंख्यायां एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६९ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत रथातिरथसंख्यानपर्वमें पाण्डवपक्षके रथियों और अतिरथियोंका संख्याविषयक एक सौ उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६९ ।।