महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1101, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंतस्मिंश्च निधनं प्राप्ते सत्यवत्या मते स्थितः । विचित्रवीर्यं राजानमभ्यषिञ्चं यथाविधि ॥ ६ ॥ तदनन्तर जब चित्रांगदकी भी मृत्यु हो गयी; तब माता सत्यवतीकी सम्मतिसे मैंने विधिपूर्वक विचित्रवीर्यका राजाके पदपर अभिषेक किया ॥ ६ ॥
मयाभिषिक्तो राजेन्द्र यवीयानपि धर्मतः । विचित्रवीर्यो धर्मात्मा मामेव समुदैक्षत ॥ ७ ॥ राजेन्द्र! छोटे होनेपर भी मेरे द्वारा अभिषिक्त होकर धर्मात्मा विचित्रवीर्य धर्मतः मेरी ही ओर देखा करते थे अर्थात् मेरी सम्मतिसे ही सारा राजकार्य करते थे ॥ ७ ॥
तस्य दारक्रियां तात चिकीर्षुरहमप्युत । अनुरूपादिव कुलादित्येव च मनो दधे ॥ ८ ॥ तात! तब मैंने अपने योग्य कुलसे कन्या लाकर उनका विवाह करनेका निश्चय किया ॥ ८ ॥
तथाश्रौषं महाबाहो तिस्रः कन्याः स्वयंवराः । रूपेणाप्रतिमाः सर्वाः काशिराजसुतास्तदा । अम्बां चैवाम्बिकां चैव तथैवाम्बालिकामपि ॥ ९ ॥ महाबाहो! उन्हीं दिनों मैंने सुना कि काशिराजकी तीन कन्याएँ हैं, जो सब-की-सब अप्रतिम रूप-सौन्दर्यसे सुशोभित हैं और वे स्वयंवर-सभामें स्वयं ही पतिका चुनाव करनेवाली हैं। उनके नाम हैं अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका ॥ ९ ॥
राजानश्च समाहूताः पृथिव्यां भरतर्षभ । अम्बा ज्येष्ठाभवत् तासामम्बिका त्वथ मध्यमा ॥ १० ॥ अम्बालिका च राजेन्द्र राजकन्या यवीयसी । सोऽहमेकरथेनैव गतः काशिपतेः पुरीम् ॥ ११ ॥ भरतश्रेष्ठ! राजेन्द्र! उन तीनोंके स्वयंवरके लिये भूमण्डलके सम्पूर्ण नरेश आमन्त्रित किये गये थे। उनमें अम्बा सबसे बड़ी थी, अम्बिका मझली थी और राजकन्या अम्बालिका सबसे छोटी थी। स्वयंवरका समाचार पाकर मैं एक ही रथके द्वारा काशिराजके नगरमें गया ॥ १०-११ ॥
अपश्यं ता महाबाहो तिस्रः कन्याः स्वलंकृताः । राज्ञश्चैव समाहूतान् पार्थिवान् पृथिवीपते ॥ १२ ॥ महाबाहो! वहाँ पहुँचकर मैंने वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हुई उन तीनों कन्याओंको देखा। पृथ्वीपते! वहाँ उसी समय आमन्त्रित होकर आये हुए सम्पूर्ण राजाओंपर भी मेरी दृष्टि पड़ी ॥ १२ ॥
ततोऽहं तान् नृपान् सर्वानह्वय समरे स्थितान् । रथमारोपयांचक्रे कन्यास्ता भरतर्षभ ॥ १३ ॥