महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1102, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंभरतश्रेष्ठ! तदनन्तर मैंने युद्धके लिये खड़े हुए उन समस्त राजाओंको ललकारकर उन तीनों कन्याओंको अपने रथपर बैठा लिया ॥ १३ ॥ वीर्यशुल्काश्च ता ज्ञात्वा समारोप्य रथं तदा । अवोचं पार्थिवान् सर्वानहं तत्र समागतान् ॥ भीष्मः शान्तनवः कन्या हरतीति पुनः पुनः ॥ १४ ॥ ते यतध्वं परं शक्त्या सर्वे मोक्षाय पार्थिवाः । प्रसह्य हि हराम्येष मिषतां वो नरर्षभाः ॥ १५ ॥ पराक्रम ही इन कन्याओंका शुल्क है, यह जानकर उन्हें रथपर चढ़ा लेनेके पश्चात् मैंने वहाँ आये हुए समस्त भूपालोंसे कहा—'नरश्रेष्ठ राजाओ! शान्तनुपुत्र भीष्म इन राजकन्याओंका अपहरण कर रहा है, तुम सब लोग पूरी शक्ति लगाकर इन्हें छुड़ानेका प्रयत्न करो; क्योंकि मैं तुम्हारे देखते-देखते बलपूर्वक इन्हें लिये जाता हूँ'; इस बातको मैंने बारंबार दुहराया ॥ १४-१५ ॥ ततस्ते पृथिवीपालाः समुत्पेतुरुदायुधाः । योगो योग इति क्रुद्धाः सारथीनभ्यचोदयन् ॥ १६ ॥ फिर तो वे महीपाल कुपित हो हाथमें हथियार लिये टूट पड़े और अपने सारथियोंको 'रथ तैयार करो, रथ तैयार करो' इस प्रकार आदेश देने लगे ॥ १६ ॥ ते रथैर्गजसंकाशैर्गजैश्च गजयोधिनः । पुष्टैश्चाश्वैर्महीपालाः समुत्पेतुरुदायुधाः ॥ १७ ॥ वे राजा हाथियोंके समान विशाल रथों, हाथियों और हृष्ट-पुष्ट अश्वोंपर सवार हो अस्त्र-शस्त्र लिये मुझपर आक्रमण करने लगे। उनमेंसे कितने ही हाथियोंपर सवार होकर युद्ध करनेवाले थे ॥ १७ ॥ ततस्ते मां महीपालाः सर्व एव विशाम्पते । रथव्रातेन महता सर्वतः पर्यवारयन् ॥ १८ ॥ प्रजानाथ! तदनन्तर उन सब नरेशोंने विशाल रथ-समूहद्वारा मुझे सब ओरसे घेर लिया ॥ १८ ॥ तानहं शरवर्षेण समन्तात् पर्यवारयम् । सर्वान् नृपांश्चाप्यजयं देवराडिव दानवान् ॥ १९ ॥ तब मैंने भी बाणोंकी वर्षा करके चारों ओरसे उनकी प्रगति रोक दी और जैसे देवराज इन्द्र दानवोंपर विजय पाते हैं, उसी प्रकार मैंने भी उन सब नरेशोंको जीत लिया ॥ १९ ॥ अपातयं शरैर्दीप्तैः प्रहसन् भरतर्षभ । तेषामापततां चित्रान् ध्वजान् हेमपरिष्कृतान् ॥ २० ॥ भरतश्रेष्ठ! जिस समय उन्होंने आक्रमण किया उसी समय मैंने प्रज्वलित बाणोंद्वारा हँसते-हँसते उनके स्वर्णभूषित विचित्र ध्वजोंको काट गिराया ॥ २० ॥