महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1103, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकैकेन हि बाणेन भूमौ पातितवानहम् । हयांस्तेषां गजांश्चैव सारथींश्चाप्यहं रणे ॥ २१ ॥ फिर एक-एक बाण मारकर मैंने समरभूमिमें उनके घोड़ों, हाथियों और सारथियोंको भी धराशायी कर दिया ।। २१ ।।
ते निवृत्ताश्च भग्नाश्च दृष्ट्वा तल्लाघवं मम । (प्रणिपेतुश्च सर्वे वै प्रशंसुश्च पार्थिवाः । तत आदाय ताः कन्या नृपतींश्च विसृज्य तान् ।। ) अथाहं हास्तिनपुरमायां जित्वा महीक्षितः ॥ २२ ॥ मेरे हाथोंकी वह फुर्ती देखकर वे पीछे हटने और भागने लगे। वे सब भूपाल नतमस्तक हो गये और मेरी प्रशंसा करने लगे। तत्पश्चात् मैं राजाओंको परास्त करके उन सबको वहीं छोड़ तीनों कन्याओंको साथ ले हस्तिनापुरमें आया ।। २२ ।।
ततोऽहं ताश्च कन्या वै भ्रातुरर्थाय भारत । तच्च कर्म महाबाहो सत्यवत्यै न्यवेदयम् ॥ २३ ॥ महाबाहु भरतनन्दन! फिर मैंने उन कन्याओंको अपने भाईसे ब्याहनेके लिये माता सत्यवतीको सौंप दिया और अपना वह पराक्रम भी उन्हें बताया ।। २३ ।।
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि कन्याहरणे त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें कन्याहरणविषयक एक सौ तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७३ ।। [दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २४ श्लोक हैं।]