महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1131, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें'महामुने राम! प्रभो! ऐसा होनेसे आपकी कही हुई बात सत्य सिद्ध होगी। वीरवर भार्गव! आपने समस्त क्षत्रियोंको जीतकर ब्राह्मणोंके बीचमें यह प्रतिज्ञा की थी कि यदि कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र ब्राह्मणोंसे द्वेष करेगा तो मैं उसे निश्चय ही मार डालूँगा। साथ ही भयभीत होकर शरणमें आये हुए शरणार्थियोंका परित्याग मैं जीते-जी किसी प्रकार नहीं कर सकूँगा और जो युद्धमें एकत्र हुए सम्पूर्ण क्षत्रियोंको जीत लेगा, उस तेजस्वी पुरुषका भी मैं वध कर डालूँगा ।। ११—१४ १/२ ।। स एवं विजयी राम भीष्मः कुरुकुलोद्वहः । तेन युध्यस्व संग्रामे समेत्य भृगुनन्दन ।। १५ ।। 'भृगुनन्दन राम! इस प्रकार कुरुकुलका भार वहन करनेवाला भीष्म समस्त क्षत्रियोंपर विजय पा चुका है; अतः आप संग्राममें उसके सामने जाकर युद्ध कीजिये' ।। १५ ।।
राम उवाच
स्मराम्यहं पूर्वकृतां प्रतिज्ञामृषिसत्तम । तथैव च चरिष्यामि यथा साम्नैव लप्स्यते ।। १६ ।। **परशुरामजी बोले—**मुनिश्रेष्ठ! मुझे अपनी पहलेकी की हुई प्रतिज्ञाका स्मरण है, तथापि मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा कि सामनीतिसे ही काम बन जाय ।। १६ ।। कार्यमेतन्महद् ब्रह्मन् काशिकन्यामनोगतम् । गमिष्यामि स्वयं तत्र कन्यामादाय यत्र सः ।। १७ ।। ब्रह्मन्! काशिराजकी कन्याके मनमें जो यह कार्य है, वह महान् है। मैं उसकी सिद्धिके लिये इस कन्याको साथ लेकर स्वयं ही वहाँ जाऊँगा, जहाँ भीष्म है ।। १७ ।। यदि भीष्मो रणश्लाघी न करिष्यति मे वचः । हनिष्याम्येनमुद्रिक्तमिति मे निश्चिता मतिः ।। १८ ।। यदि युद्धकी स्पृहा रखनेवाला भीष्म मेरी बात नहीं मानेगा तो मैं उस अभिमानीको मार डालूँगा; यह मेरा निश्चित विचार है ।। १८ ।। न हि बाणा मयोत्सृष्टाः सज्जन्तीह शरीरिणाम् । कायेषु विदितं तुभ्यं पुरा क्षत्रियसंगरे ।। १९ ।। मेरे चलाये हुए बाण देहधारियोंके शरीरमें अटकते नहीं हैं। (उन्हें विदीर्ण करके बाहर निकल जाते हैं।) यह बात तुम्हें पूर्वकालमें क्षत्रियोंके साथ होनेवाले युद्धके समय ज्ञात हो चुकी है ।। १९ ।। एवमुक्त्वा ततो रामः सह तैर्ब्रह्मवादिभिः । प्रयाणाय मतिं कृत्वा समुत्तस्थौ महातपाः ।। २० ।। ऐसा कहकर महातपस्वी परशुरामजी उन ब्रह्मवादी महर्षियोंके साथ प्रस्थान करनेका निश्चय करके उसके लिये उद्यत हो गये ।। २० ।।