महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1132, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंततस्ते तामुषित्वा तु रजनीं तत्र तापसाः । हुताग्नयो जप्तजप्याः प्रतस्थुर्मज्जिघांसया ॥ २१ ॥ तत्पश्चात् रातभर वहीं रहकर प्रातःकाल संध्योपासन, गायत्री-जप और अग्निहोत्र करके वे तपस्वी मुनि मेरा वध करनेकी इच्छासे उस आश्रमसे चले ॥ २१ ॥
अभ्यगच्छत् ततो रामः सह तैर्ब्रह्मवादिभिः । कुरुक्षेत्रं महाराज कन्यया सह भारत ॥ २२ ॥ महाराज भरतनन्दन! फिर उन वेदवादी मुनियोंको साथ ले परशुरामजी राजकन्या अम्बाके साथ कुरुक्षेत्रमें आये ॥ २२ ॥
न्यविशन्त ततः सर्वे परिगृह्य सरस्वतीम् । तापसास्ते महात्मानो भृगुश्रेष्ठपुरस्कृताः ॥ २३ ॥ वहाँ भृगुश्रेष्ठ परशुरामजीको आगे करके उन सभी तपस्वी महात्माओंने सरस्वती नदीके तटका आश्रय ले रात्रिमें निवास किया ॥ २३ ॥
भीष्म उवाच
ततस्तृतीये दिवसे संदेश व्यवस्थितः । कुरु प्रियं स मे राजन् प्राप्तोऽस्मीति महाव्रतः ॥ २४ ॥ भीष्मजी कहते हैं—तदनन्तर तीसरे दिन (हस्तिनापुरके बाहर) एक स्थानपर ठहरकर महान् व्रतधारी परशुरामजीने मुझे संदेश दिया—‘राजन्! मैं यहाँ आया हूँ। तुम मेरा प्रिय कार्य करो’ ॥ २४ ॥
तमागतमहं श्रुत्वा विषयान्तं महाबलम् । अभ्यगच्छं जवेनाशु प्रीत्या तेजोनिधिं प्रभुम् ॥ २५ ॥ तेजके भण्डार और महाबली भगवान् परशुरामको अपने राज्यकी सीमापर आया हुआ सुनकर मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ वेगपूर्वक उनके पास गया ॥ २५ ॥
गां पुरस्कृत्य राजेन्द्र ब्राह्मणैः परिवारितः । ऋत्विग्भिर्देवकल्पैश्च तथैव च पुरोहितैः ॥ २६ ॥ राजेन्द्र! उस समय एक गौको आगे करके ब्राह्मणोंसे घिरा हुआ मैं देवताओंके समान तेजस्वी ऋत्विजों तथा पुरोहितोंके साथ उनकी सेवामें उपस्थित हुआ ॥ २६ ॥
स मामभिगतं दृष्ट्वा जामदग्न्यः प्रतापवान् । प्रतिजग्राह तां पूजां वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २७ ॥ मुझे अपने समीप आया हुआ देख प्रतापी परशुरामजीने मेरी दी हुई पूजा स्वीकार की और इस प्रकार कहा ॥ २७ ॥
राम उवाच
भीष्म कां बुद्धिमास्थाय काशिराजसुता तदा ।