भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 1134, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 1134

तब यह सुनकर परशुरामजीके नेत्रोंमें क्रोधका भाव व्याप्त हो गया और वे मुझसे इस प्रकार बोले—‘नरश्रेष्ठ! तुम यदि मेरी यह बात नहीं मानोगे तो आज मैं मन्त्रियोंसहित तुम्हें मार डालूँगा।’ इस बातको उन्होंने बार-बार दुहराया ॥ ३५१/२ ॥ संरम्भादब्रवीद् रामः क्रोधपर्याकुलेक्षणः ॥ ३६ ॥ तमहं गीर्भिरिष्टाभिः पुनः पुनररिंदम । अयाचं भृगुशार्दूलं न चैव प्रशशाम सः ॥ ३७ ॥ शत्रुदमन दुर्योधन! परशुरामजीने क्रोधभरे नेत्रोंसे देखते हुए बड़े रोषावेशमें आकर यह बात कही थी, तथापि मैं प्रिय वचनोंद्वारा उन भृगुश्रेष्ठ महात्मासे बार-बार शान्त रहनेके लिये प्रार्थना करता रहा; पर वे किसी प्रकार शान्त न हो सके ॥ ३६-३७ ॥ प्रणम्य तमहं मूर्ध्ना भूयो ब्राह्मणसत्तमम् । अब्रुवं कारणं किं तद् यत् त्वं युद्धं मयेच्छसि ॥ ३८ ॥ इष्वस्त्रं मम बालस्य भवतैव चतुर्विधम् । उपदिष्टं महाबाहो शिष्योऽस्मि तव भार्गव ॥ ३९ ॥ तब मैंने उन ब्राह्मणशिरोमणिके चरणोंमें मस्तक झुकाकर पुनः प्रणाम किया और इस प्रकार पूछा—‘भगवन्! क्या कारण है कि आप मेरे साथ युद्ध करना चाहते हैं? बाल्यावस्थामें आपने ही मुझे चार प्रकारके धनुर्वेदकी शिक्षा दी है। महाबाहु भार्गव! मैं तो आपका शिष्य हूँ’ ॥ ३८-३९ ॥ ततो मामब्रवीद् रामः क्रोधसंरक्तलोचनः । जानीषे मां गुरुं भीष्म गृह्णासीमां न चैव ह ॥ ४० ॥ सुतां काश्यस्य कौरव्य मत्प्रियार्थं महामते । न हि ते विद्यते शान्तिरन्यथा कुरुनन्दन ॥ ४१ ॥ तब परशुरामजीने क्रोधसे लाल आँखें करके मुझसे कहा—‘महामते भीष्म! तुम मुझे अपना गुरु तो समझते हो; परंतु मेरा प्रिय करनेके लिये काशिराजकी इस कन्याको ग्रहण नहीं करते हो; किंतु कुरुनन्दन! ऐसा किये बिना तुम्हें शान्ति नहीं मिल सकती ॥ ४०-४१ ॥ गृहाणेमां महाबाहो रक्षस्व कुलमात्मनः । त्वया विभ्रंशिता हीयं भर्तारं नाधिगच्छति ॥ ४२ ॥ ‘महाबाहो! इसे ग्रहण कर लो और इस प्रकार अपने कुलकी रक्षा करो। तुम्हारे द्वारा अपनी मर्यादासे गिर जानेके कारण इसे पतिकी प्राप्ति नहीं हो रही है’ ॥ तथा ब्रुवन्तं तमहं रामं परपुरंजयम् । नैतदेवं पुनर्भावि ब्रह्मर्षे किं श्रमेण ते ॥ ४३ ॥ ऐसी बातें करते हुए शत्रुनगरविजयी परशुरामजीसे मैंने स्पष्ट कह दिया—‘ब्रह्मर्षे! अब फिर ऐसी बात नहीं हो सकती। इस विषयमें आपके परिश्रमसे क्या होगा? ॥ ४३ ॥

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