भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1135

गुरुत्वं त्वयि सम्प्रेक्ष्य जामदग्न्य पुरातनम् । प्रसादये त्वां भगवंस्त्यक्तैषा तु पुरा मया ॥ ४४ ॥ 'जमदग्निनन्दन! भगवन्! आप मेरे प्राचीन गुरु हैं, यह सोचकर ही मैं आपको प्रसन्न करनेकी चेष्टा कर रहा हूँ। इस अम्बाको तो मैंने पहले ही त्याग दिया था ॥ ४४ ॥ को जातु परभावां हि नारीं व्यालीमिव स्थिताम् । वासयेत गृहे जानन् स्त्रीणां दोषो महात्ययः ॥ ४५ ॥ 'दूसरेके प्रति अनुराग रखनेवाली नारी सर्पिणीके समान भयंकर होती है। कौन ऐसा पुरुष होगा, जो जान-बूझकर उसे कभी भी अपने घरमें स्थान देगा; क्योंकि स्त्रियोंका (परपुरुषमें अनुरागरूप) दोष महान् अनर्थका कारण होता है ॥ ४५ ॥ न भयाद् वासवस्यापि धर्मं जह्यां महाव्रत । प्रसीद मा वा यद् वा ते कार्यं तत् कुरु मा चिरम् ॥ ४६ ॥ 'महान् व्रतधारी राम! मैं इन्द्रके भी भयसे धर्मका त्याग नहीं कर सकता। आप प्रसन्न हों या न हों। आपको जो कुछ करना हो, शीघ्र कर डालिये ॥ ४६ ॥ अयं चापि विशुद्धात्मन् पुराणे श्रूयते विभो । मरुत्तेन महाबुद्धे गीतः श्लोको महात्मना ॥ ४७ ॥ “गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः । उत्पथप्रतिपन्नस्य परित्यागो विधीयते” ॥ ४८ ॥ 'विशुद्ध हृदयवाले परम बुद्धिमान् राम! पुराणमें महात्मा मरुत्तके द्वारा कहा हुआ यह श्लोक सुननेमें आता है कि यदि गुरु भी गर्वमें आकर कर्तव्य और अकर्तव्यको न समझते हुए कुपथका आश्रय ले तो उसका परित्याग कर दिया जाता है ॥ ४७-४८ ॥ स त्वं गुरुरिति प्रेम्णा मया सम्मानितो भृशम् । गुरुवृत्तिं न जानीषे तस्माद् योत्स्यामि वै त्वया ॥ ४९ ॥ 'आप मेरे गुरु हैं, यह समझकर मैंने प्रेमपूर्वक आपका अधिक-से-अधिक सम्मान किया है; परंतु आप गुरुका-सा बर्ताव नहीं जानते; अतः मैं आपके साथ युद्ध करूँगा ॥ ४९ ॥ गुरुं न हन्यां समरे ब्राह्मणं च विशेषतः । विशेषतस्तपोवृद्धमेवं क्षान्तं मया तव ॥ ५० ॥ 'एक तो आप गुरु हैं। उसमें भी विशेषतः ब्राह्मण हैं। उसपर भी विशेष बात यह है कि आप तपस्यामें बढ़े-चढ़े हैं। अतः आप-जैसे पुरुषको मैं कैसे मार सकता हूँ? यही सोचकर मैंने अबतक आपके तीक्ष्ण बर्तावको चुपचाप सह लिया ॥ ५० ॥ उद्यतेषुमथो दृष्ट्वा ब्राह्मणं क्षत्रबन्धुवत् । यो हन्यात् समरे क्रुद्धं युध्यन्तमपलायिनम् ॥ ५१ ॥ ब्रह्महत्या न तस्य स्यादिति धर्मेषु निश्चयः ।