भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1137

‘युद्धप्रिय महाबाहु तपोधन! अब आप लौटिये और कुरुक्षेत्रमें ही चलिये। मैं युद्धके लिये वहीं आपके पास आऊँगा।। ५९ ।। अपि यत्र त्वया राम कृतं शौचं पुरा पितुः । तत्राहमपि हत्वा त्वां शौचं कर्तास्मि भार्गव ।। ६० ।। ‘भृगुनन्दन परशुराम! जहाँ पूर्वकालमें अपने पिताको अंजलि-दान देकर आपने आत्मशुद्धिका अनुभव किया था, वहीं मैं भी आपको मारकर आत्मशुद्धि करूँगा।। तत्र राम समागच्छ त्वरितं युद्धदुर्मद । व्यपनेष्यामि ते दर्पं पौराणं ब्राह्मणब्रुव ।। ६१ ।। ‘ब्राह्मण कहलानेवाले रणदुर्मद राम! आप तुरंत कुरुक्षेत्रमें पधारिये। मैं वहीं आकर आपके पुरातन दर्पका दलन करूँगा’।। ६१ ।। यच्चापि कत्थसे राम बहुशः परिषत्सु वै । निर्जिताः क्षत्रिया लोके मयैकेनेति तच्छृणु ।। ६२ ।। ‘राम! आप जो बहुत बार भरी सभाओंमें अपनी प्रशंसाके लिये यह कहा करते हैं कि मैंने अकेले ही संसारके समस्त क्षत्रियोंको जीत लिया था तो उसका उत्तर सुन लीजिये।। ६२ ।। न तदा जातवान् भीष्मः क्षत्रियो वापि मद्विधः । पश्चाज्जातानि तेजांसि तृणेषु ज्वलितं त्वया ।। ६३ ।। ‘उन दिनों भीष्म अथवा मेरे-जैसा दूसरा कोई क्षत्रिय नहीं उत्पन्न हुआ था। तेजस्वी क्षत्रिय तो पीछे उत्पन्न हुए हैं। आप तो घास-फूसमें ही प्रज्वलित हुए हैं (तिनकोंके समान दुर्बल क्षत्रियोंपर ही अपना तेज प्रकट किया है)।। ६३ ।। यस्ते युद्धमयं दर्पं कामं च व्यपनाशयेत् । सोऽहं जातो महाबाहो भीष्मः परपुरंजयः । व्यपनेष्यामि ते दर्पं युद्धे राम न संशयः ।। ६४ ।। ‘महाबाहो! जो आपकी युद्धविषयक कामना तथा अभिमानको नष्ट कर सके, वह शत्रुनगरीपर विजय पानेवाला यह भीष्म तो अब उत्पन्न हुआ है। राम! मैं युद्धमें आपका सारा घमंड चूर-चूर कर दूँगा, इसमें संशय नहीं है’।। ६४ ।।

भीष्म उवाच

ततो मामब्रवीद् रामः प्रहसन्निव भारत । दिष्ट्या भीष्म मया सार्धं योद्धुमिच्छसि संगरे ।। ६५ ।। **भीष्मजी कहते हैं—**भरतनन्दन! तब परशुरामजीने मुझसे हँसते हुए-से कहा—‘भीष्म! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम रणक्षेत्रमें मेरे साथ युद्ध करना चाहते हो।। ६५ ।।