महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1138, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअयं गच्छामि कौरव्य कुरुक्षेत्रं त्वया सह । भाषितं ते करिष्यामि तत्रागच्छ परंतप ॥ ६६ ॥ तत्र त्वां निहतं माता मया शरशताचितम् । जाह्नवी पश्यतां भीष्म गृध्रकङ्कबलाशनम् ॥ ६७ ॥ 'कुरुनन्दन! यह देखो, मैं तुम्हारे साथ युद्धके लिये कुरुक्षेत्रमें चलता हूँ। परंतप! वहीं आओ। मैं तुम्हारा कथन पूरा करूँगा। वहाँ तुम्हारी माता गंगा तुम्हें मेरे हाथसे मरकर सैकड़ों बाणोंसे व्याप्त और कौओं, कंकों तथा गीधोंका भोजन बना हुआ देखेगी ॥ ६६-६७ ॥ कृपणं त्वामभिप्रेक्ष्य सिद्धचारणसेविता । मया विनिहतं देवी रोदतामद्य पार्थिव ॥ ६८ ॥ 'राजन्! तुम दीन हो। आज तुम्हें मेरे हाथसे मारा गया देख सिद्ध-चारणसेविता गंगादेवी रुदन करें ॥ ६८ ॥ अतदर्हा महाभागा भगीरथसुतानघा । या त्वामजीजनन्मन्दं युद्धकामुकमातुरम् ॥ ६९ ॥ 'यद्यपि वे महाभागा भगीरथपुत्री पापहीना गंगा यह दुःख देखनेके योग्य नहीं हैं, तथापि जिन्होंने तुम-जैसे युद्धकामी, आतुर एवं मूर्ख पुत्रको जन्म दिया है, उन्हें यह कष्ट भोगना ही पड़ेगा ॥ ६९ ॥ एहि गच्छ मया भीष्म युद्धकामुक दुर्मद । गृहाण सर्वं कौरव्य रथादि भरतर्षभ ॥ ७० ॥ 'युद्धकी इच्छा रखनेवाले मदोन्मत्त भीष्म! आओ, मेरे साथ चलो। भरतश्रेष्ठ कुरुनन्दन! रथ आदि सारी सामग्री साथ ले लो' ॥ ७० ॥ इति ब्रुवाणं तमहं रामं परपुरंजयम् । प्रणम्य शिरसा राममेवमस्त्वित्यथाब्रुवम् ॥ ७१ ॥ शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले परशुरामजीको इस प्रकार कहते देख मैंने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और 'एवमस्तु' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की ॥ ७१ ॥ एवमुक्त्वा ययौ रामः कुरुक्षेत्रं युयुत्सया । प्रविश्य नगरं चाहं सत्यवत्यै न्यवेदयम् ॥ ७२ ॥ ऐसा कहकर परशुरामजी युद्धकी इच्छासे कुरुक्षेत्रमें गये और मैंने नगरमें प्रवेश करके सत्यवतीसे यह सारा समाचार निवेदन किया ॥ ७२ ॥ ततः कृतस्वस्त्ययनो मात्रा च प्रतिनन्दितः । द्विजातीन् वाच्य पुण्याहं स्वस्ति चैव महाद्युते ॥ ७३ ॥ रथमास्थाय रुचिरं राजतं पाण्डुरैर्हयैः । सूपस्करं स्वधिष्ठानं वैयाघ्रपरिवारणम् ॥ ७४ ॥