महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1139, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपपन्नं महाशस्त्रैः सर्वोपकरणान्वितम् । तत्कुलीनेन वीरेण हयशास्त्रविदा रणे ॥ ७५ ॥ यन्तृं सूतेन शिष्टेन बहुशो दृष्टकर्मणा । महातेजस्वी नरेश! उस समय स्वस्तिवाचन कराकर माता सत्यवतीने मेरा अभिनन्दन किया और मैं ब्राह्मणोंसे पुण्याहवाचन करा उनसे कल्याणकारी आशीर्वाद ले सुन्दर रजतमय रथपर आरूढ़ हुआ। उस रथमें श्वेत रंगके घोड़े जुते हुए थे। उसमें सब प्रकारकी आवश्यक सामग्री सुन्दर ढंगसे रखी गयी थी। उसकी बैठक बहुत सुन्दर थी। रथके ऊपर व्याघ्रचर्मका आवरण लगाया गया था। वह रथ बड़े-बड़े शस्त्रों तथा समस्त उपकरणोंसे सम्पन्न था। युद्धमें जिसका कार्य अनेक बार देख लिया गया था, ऐसे सुशिक्षित, कुलीन, वीर तथा अश्वशास्त्रके पण्डित सारथिद्वारा उस रथका संचालन और नियन्त्रण होता था ॥ ७३—७५ १/२ ॥
दंशितः पाण्डुरेणाहं कवचेन वपुष्मता ॥ ७६ ॥ पाण्डुरं कार्मुकं गृह्य प्रायां भरतसत्तम । भरतश्रेष्ठ! मैंने अपने शरीरपर श्वेतवर्णका कवच धारण करके श्वेत धनुष हाथमें लेकर यात्रा की ॥
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि ॥ ७७ ॥ पाण्डुरैश्चापि व्यजनैर्वीज्यमानो नराधिप । शुक्लवासाः सितोष्णीषः सर्वशुक्लविभूषणः ॥ ७८ ॥ नरेश्वर! उस समय मेरे मस्तकपर श्वेत छत्र तना हुआ था और मेरे दोनों ओर सफेद रंगके चँवर डुलाये जाते थे। मेरे वस्त्र, मेरी पगड़ी और मेरे समस्त आभूषण श्वेतवर्णके ही थे ॥ ७७-७८ ॥
स्तूयमानो जयाशीर्भिर्निष्क्रम्य गजसाह्वयात् । कुरुक्षेत्रं रणक्षेत्रमुपायां भरतर्षभ ॥ ७९ ॥ विजयसूचक आशीर्वादोंके साथ मेरी स्तुति की जा रही थी। भरतभूषण! उस अवस्थामें मैं हस्तिनापुरसे निकलकर कुरुक्षेत्रके समरांगणमें गया ॥ ७९ ॥
ते हयाश्चोदितास्तेन सूतेन परमाहवे । अवहन् मां भृशं राजन् मनोमारुतरंहसः ॥ ८० ॥ राजन्! मेरे घोड़े मन और वायुके समान वेगशाली थे। सारथिके हाँकनेपर उन्होंने बात-की-बातमें मुझे उस महान् युद्धके स्थानपर पहुँचा दिया ॥ ८० ॥
गत्वाहं तत् कुरुक्षेत्रं स च रामः प्रतापवान् । युद्धाय सहसा राजन् पराक्रान्तौ परस्परम् ॥ ८१ ॥ राजन्! मैं तथा प्रतापी परशुरामजी दोनों कुरुक्षेत्रमें पहुँचकर युद्धके लिये सहसा एक-दूसरेको पराक्रम दिखानेके लिये उद्यत हो गये ॥ ८१ ॥