भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1140

ततः संदर्शनेऽतिष्ठं रामस्यातितपस्विनः । प्रगृह्य शङ्खप्रवरं ततः प्राधममुत्तमम् ॥ ८२ ॥ तदनन्तर मैं अत्यन्त तपस्वी परशुरामजीकी दृष्टिके सामने खड़ा हुआ और अपने श्रेष्ठ शंखको हाथमें लेकर उसे जोर-जोरसे बजाने लगा ॥ ८२ ॥

ततस्तत्र द्विजा राजंस्तापसाश्च वनौकसः । अपश्यन्त रणं दिव्यं देवाः सेन्द्रगणास्तदा ॥ ८३ ॥ राजन्! उस समय वहाँ बहुत-से ब्राह्मण, वनवासी तपस्वी तथा इन्द्रसहित देवगण उस दिव्य युद्धको देखने लगे ॥ ८३ ॥

ततो दिव्यानि माल्यानि प्रादुरासंस्ततस्ततः । वादित्राणि च दिव्यानि मेघवृन्दानि चैव ह ॥ ८४ ॥ तदनन्तर वहाँ इधर-उधरसे दिव्य मालाएँ प्रकट होने लगीं और दिव्य वाद्य बज उठे। साथ ही सब ओर मेघोंकी घटाएँ छा गयीं ॥ ८४ ॥

ततस्ते तापसाः सर्वे भार्गवस्यानुयायिनः । प्रेक्षकाः समपद्यन्त परिवार्य रणाजिरम् ॥ ८५ ॥ तदनन्तर परशुरामजीके साथ आये हुए वे सब तपस्वी उस संग्रामभूमिको सब ओरसे घेरकर दर्शक बन गये ॥ ८५ ॥

ततो मामब्रवीद् देवी सर्वभूतहितैषिणी । माता स्वरूपिणी राजन् किमिदं ते चिकीर्षितम् ॥ ८६ ॥ राजन्! उस समय समस्त प्राणियोंका हित चाहनेवाली मेरी माता गंगादेवी स्वरूपतः प्रकट होकर बोलीं—'बेटा! यह तू क्या करना चाहता है? ॥ ८६ ॥

गत्वाहं जामदग्न्यं तु प्रयाचिष्ये कुरुद्वह । भीष्मेण सह मा योत्सीः शिष्येणेति पुनः पुनः ॥ ८७ ॥ 'कुरुश्रेष्ठ! मैं स्वयं जाकर जमदग्निनन्दन परशुरामजीसे बारंबार याचना करूँगी कि आप अपने शिष्य भीष्मके साथ युद्ध न कीजिये ॥ ८७ ॥

मा मैवं पुत्र निर्बन्धं कुरु विप्रेण पार्थिव । जामदग्न्येन समरे योद्धुमित्येव भर्त्सयत् ॥ ८८ ॥ 'बेटा! तू ऐसा आग्रह न कर। राजन्! विप्रवर जमदग्निनन्दन परशुरामके साथ समरभूमिमें युद्ध करनेका हठ अच्छा नहीं है।' ऐसा कहकर वे डाँट बताने लगीं ॥

किन्नु वै क्षत्रियहणो हरतुल्यपराक्रमः । विदितः पुत्र रामस्ते यतस्तं योद्धुमिच्छसि ॥ ८९ ॥ अन्तमें वे फिर बोलीं—'बेटा! क्षत्रियहन्ता परशुराम महादेवजीके समान पराक्रमी हैं। क्या तू उन्हें नहीं जानता, जो उनके साथ युद्ध करना चाहता है?' ॥ ८९ ॥

ततोऽहमब्रुवं देवीमभिवाद्य कृताञ्जलिः ।