महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1141, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वं तद् भरतश्रेष्ठ यथावृत्तं स्वयंवरे ॥ ९० ॥ तब मैंने हाथ जोड़कर गंगादेवीको प्रणाम किया और स्वयंवरमें जैसी घटना घटित हुई थी, वह सब वृत्तान्त उनसे आद्योपान्त कह सुनाया ॥ ९० ॥
यथा च रामो राजेन्द्र मया पूर्वं प्रचोदितः । काशिराजसुतायाश्च यथा कर्म पुरातनम् ॥ ९१ ॥ राजेन्द्र! मैंने परशुरामजीसे पहले जो-जो बातें कही थीं तथा काशिराजकी कन्याकी जो पुरानी करतूतें थीं, उन सबको बता दिया ॥ ९१ ॥
ततः सा राममभ्येत्य जननी मे महानदी । मदर्थं तमृषिं वीक्ष्य क्षमयामास भार्गवम् ॥ ९२ ॥ तत्पश्चात् मेरी जन्मदायिनी माता गंगाने भृगुनन्दन परशुरामजीके पास जाकर मेरे लिये उनसे क्षमा माँगी ॥
भीष्मेण सह मा योत्सीः शिष्येणेति वचोऽब्रवीत् । स च तामाह याचन्तीं भीष्ममेव निवर्तय । न च मे कुरुते काममित्यहं तमुपागमम् ॥ ९३ ॥ साथ ही यह भी कहा कि भीष्म आपका शिष्य है; अतः उसके साथ आप युद्ध न कीजिये। तब याचना करनेवाली मेरी मातासे परशुरामजीने कहा—'तुम पहले भीष्मको ही युद्धसे निवृत्त करो। वह मेरे इच्छानुसार कार्य नहीं कर रहा है; इसीलिये मैंने उसपर चढ़ाई की है' ॥ ९३ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो गङ्गा सुतस्नेहाद् भीष्मं पुनरुपागमत् । न चास्याश्चाकरोद् वाक्यं क्रोधपर्याकुलेक्षणः ॥ ९४ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तब गंगादेवी पुत्रस्नेहवश पुनः भीष्मके पास आयीं। उस समय भीष्मके नेत्रोंमें क्रोध व्याप्त हो रहा था; अतः उन्होंने भी माताका कहना नहीं माना ॥ ९४ ॥
अथादृश्यत धर्मात्मा भृगुश्रेष्ठो महातपाः । आह्वयामास च तदा युद्धाय द्विजसत्तमः ॥ ९५ ॥ इतनेमें ही भृगुकुलतिलक ब्राह्मणशिरोमणि महातपस्वी धर्मात्मा परशुरामजी दिखायी दिये। उन्होंने सामने आकर युद्धके लिये भीष्मको ललकारा ॥ ९५ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि परशुरामभीष्मयोः कुरुक्षेत्रावतरणे अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें परशुराम और भीष्मका कुरुक्षेत्रमें युद्धके लिये अवतरणविषयक एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७८ ॥