महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1150, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्पश्चात् जमदग्निकुमारने पुनः अत्यन्त क्रुद्ध होकर मुझपर प्रज्वलित मुखवाले सर्पोंकी भाँति तेज किये हुए भयानक बाण चलाये ॥ ७ ॥
ततोऽहं निशितैर्भल्लैः शतशोऽथ सहस्रशः । अच्छिदं सहसा राजन्नन्तरिक्षे पुनः पुनः ॥ ८ ॥
राजन्! तब मैंने सहसा तीखी धारवाले भल्ल नामक बाणोंसे आकाशमें ही उन सबके सैकड़ों और हजारों टुकड़े कर दिये। यह क्रिया बारंबार चलती रही ॥ ८ ॥
ततस्त्वस्त्राणि दिव्यानि जामदग्न्यः प्रतापवान् । मयि प्रयोजयामास तान्यहं प्रत्यषेधयम् ॥ ९ ॥ अस्त्रैरेव महाबाहो चिकीर्षन्नधिकां क्रियाम् ।
इसके पश्चात् प्रतापी परशुरामजीने मेरे ऊपर दिव्यास्त्रोंका प्रयोग आरम्भ किया; परंतु महाबाहो! मैंने उनसे भी अधिक पराक्रम प्रकट करनेकी इच्छा रखकर उन सब अस्त्रोंका दिव्यास्त्रोंद्वारा ही निवारण कर दिया ॥ ९ १/२ ॥
ततो दिवि महान् नादः प्रादुरासीत् समन्ततः ॥ १० ॥ ततोऽहमस्त्रं वायव्यं जामदग्न्ये प्रयुक्तवान् । प्रत्याजघ्ने च तद् रामो गुह्यकास्त्रेण भारत ॥ ११ ॥
उस समय आकाशमें चारों ओर बड़ा कोलाहल होने लगा। इसी समय मैंने जमदग्निकुमारपर वायव्यास्त्रका प्रयोग किया। भारत! परशुरामजीने गुह्यकास्त्रद्वारा मेरे उस अस्त्रको शान्त कर दिया ॥ १०-११ ॥
ततोऽहमस्त्रमाग्नेयमनुमन्त्र्य प्रयुक्तवान् । वारुणेनैव तद् रामो वारयामास मे विभुः ॥ १२ ॥
तत्पश्चात् मैंने मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया; किंतु भगवान् परशुरामने वारुणास्त्र चलाकर उसका निवारण कर दिया ॥ १२ ॥
एवमस्त्राणि दिव्यानि रामस्याहमवारयम् । रामश्च मम तेजस्वी दिव्यास्त्रविदरिंदमः ॥ १३ ॥
इस प्रकार मैं परशुरामजीके दिव्यास्त्रोंका निवारण करता और शत्रुओंका दमन करनेवाले दिव्यास्त्रवेत्ता तेजस्वी परशुराम भी मेरे अस्त्रोंका निवारण कर देते थे ॥ १३ ॥
ततो मां सव्यतो राजन् रामः कुर्वन् द्विजोत्तमः । उरस्यविध्यत् संक्रुद्धो जामदग्न्यः प्रतापवान् ॥ १४ ॥
राजन्! तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए प्रतापी विप्रवर परशुरामने मुझे बायें लेकर मेरे वक्षःस्थलको बाणद्वारा बींध दिया ॥ १४ ॥
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ संन्यषीदं रथोत्तमे । ततो मां कश्मलाविष्टं सूतस्तूर्णमुदावहत् ॥ १५ ॥