महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभरतश्रेष्ठ! उससे घायल होकर मैं उस श्रेष्ठ रथपर बैठ गया, उस समय मुझे मूर्च्छित अवस्थामें देखकर सारथि शीघ्र ही अन्यत्र हटा ले गया ।। १५ ।। ग्लायन्तं भरतश्रेष्ठ रामबाणप्रपीडितम् । ततो मामपयातं वै भृशं विद्धमचेतसम् ।। १६ ।। रामस्यानुचरा हृष्टाः सर्वे दृष्ट्वा विचुक्रुशुः । अकृतव्रणप्रभृतयः काशिकन्या च भारत ।। १७ ।। भरतश्रेष्ठ! परशुरामजीके बाणसे अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण मुझे बड़ी व्याकुलता हो रही थी। मैं अत्यन्त घायल और अचेत होकर रणभूमिसे दूर हट गया था। भारत! इस अवस्थामें मुझे देखकर परशुरामजीके अकृतव्रण आदि सेवक तथा काशिराजकी कन्या अम्बा ये सब-के-सब अत्यन्त प्रसन्न हो कोलाहल करने लगे ।। १६-१७ ।। ततस्तु लब्धसंज्ञोऽहं ज्ञात्वा सूतमथाब्रुवम् । याहि सूत यतो रामः सज्जोऽहं गतवेदनः ।। १८ ।। इतनेहीमें मुझे चेत हो गया और सब कुछ जानकर मैंने सारथिसे कहा—‘सूत! जहाँ परशुरामजी हैं, वहीं चलो। मेरी पीड़ा दूर हो गयी है और अब मैं युद्धके लिये सुसज्जित हूँ’ ।। १८ ।। ततो मामवहत् सूतो हयैः परमशोभितैः । नृत्यद्भिरिव कौरव्य मारुतप्रतिमैर्गतौ ।। १९ ।। कुरुनन्दन! तब सारथिने अत्यन्त शोभाशाली अश्वोंद्वारा, जो वायुके समान वेगसे चलनेके कारण नृत्य करते-से जान पड़ते थे, मुझे युद्धभूमिमें पहुँचाया ।। १९ ।। ततोऽहं राममासाद्य बाणवर्षैश्च कौरव । अवाकिरं सुसंरब्धः संरब्धं च जिगीषया ।। २० ।। कौरव! तब मैंने क्रोधमें भरे हुए परशुरामजीके पास पहुँचकर उन्हें जीतनेकी इच्छासे स्वयं भी कुपित होकर उनके ऊपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ।। २० ।। तानापतत एवासौ रामो बाणानजिह्मगान् । बाणैरेवाच्छिनत् तूर्णमेकैकं त्रिभिराहवे ।। २१ ।। किंतु परशुरामजीने सीधे लक्ष्यकी ओर जानेवाले उन बाणोंके आते ही एक-एकको तीन-तीन बाणोंसे तुरंत काट दिया ।। २१ ।। ततस्ते सूदिताः सर्वे मम बाणाः सुसंशिताः । रामबाणैर्द्विधा छिन्नाः शतशोऽथ सहस्रशः ।। २२ ।। इस प्रकार मेरे चलाये हुए वे सब सैकड़ों और हजारों तीखे बाण परशुरामजीके सायकोंसे कटकर दो-दो टूक हो नष्ट हो गये ।। २२ ।। ततः पुनः शरं दीप्तं सुप्रभं कालसम्मितम् । असृजं जामदग्न्याय रामायाहं जिघांसया ।। २३ ।।