महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1152, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब मैंने पुनः जमदग्निनन्दन परशुरामकी ओर उन्हें मार डालनेकी इच्छासे एक कालाग्निके समान प्रज्वलित तथा तेजस्वी बाण छोड़ा ॥ २३ ॥
तेन त्वभिहतो गाढं बाणवेगवशं गतः ।
मुमोह समरे रामो भूमौ च निपपात ह ॥ २४ ॥
उसकी गहरी चोट खाकर परशुरामजी उस बाणके वेगके अधीन हो समरभूमिमें मूर्च्छित हो गये और धरतीपर गिर पड़े ॥ २४ ॥
ततो हाहाकृतं सर्वं रामे भूतलाश्रिते ।
जगद् भारत संविग्नं यथार्कपतने भवेत् ॥ २५ ॥
परशुरामके पृथ्वीपर गिरते ही मानो आकाशसे सूर्य टूटकर गिरे हों, ऐसा समझकर सारा जगत् भयभीत हो हाहाकार करने लगा ॥ २५ ॥
तत एनं समुद्विग्नाः सर्व एवाभिदुद्रुवुः ।
तपोधनास्ते सहसा काश्या च कुरुनन्दन ॥ २६ ॥
तत एनं परिष्वज्य शनैराश्वासयंस्तदा ।
पाणिभिर्जलशीतैश्च जयाशीर्भिश्च कौरव ॥ २७ ॥
कुरुनन्दन! उस समय वे तपोधन और काशिराजकी कन्या सब-के-सब अत्यन्त उद्विग्न हो सहसा उनके पास दौड़े गये और उन्हें हृदयसे लगा हाथ फेरकर तथा शीतल जल छिड़ककर विजयसूचक आशीर्वाद देते हुए सान्त्वना देने लगे ॥ २६-२७ ॥
ततः स विह्वलं वाक्यं राम उत्थाय चाब्रवीत् ।
तिष्ठ भीष्म हतोऽसीति बाणं संधाय कार्मुके ॥ २८ ॥
तदनन्तर कुछ स्वस्थ होनेपर परशुरामजी उठ गये और धनुषपर बाण चढ़ाकर विह्वल स्वरमें बोले—'भीष्म! खड़े रहो, अब तुम मारे गये' ॥ २८ ॥
स मुक्तो न्यपतत् तूर्णं सव्ये पार्श्वे महाहवे ।
येनाहं भृशमुद्विग्नो व्याघूर्णित इव द्रुमः ॥ २९ ॥
उस महान् युद्धमें उनके धनुषसे छूटा हुआ वह बाण तुरंत मेरी बायीं पसलीपर पड़ा, जिससे मैं अत्यन्त उद्विग्न होकर वृक्षकी भाँति झूमने लगा ॥ २९ ॥
हत्वा हयांस्ततो रामः शीघ्रास्त्रेण महाहवे ।
अवाकिरन्मां विस्रब्धो बाणैस्तैर्लोमवाहिभिः ॥ ३० ॥
फिर तो परशुरामजी उस महासमरमें शीघ्र छोड़े हुए अस्त्रद्वारा मेरे घोड़ोंको मारकर निर्भय हो मेरे ऊपर पाँखसे उड़नेवाले बाणोंसे वर्षा करने लगे ॥ ३० ॥
ततोऽहमपि शीघ्रास्त्रं समरप्रतिवारणम् ।
अवासृजं महाबाहो तेऽन्तराधिष्ठिताः शत: ॥ ३१ ॥
रामस्य मम चैवाशु व्योमावृत्य समन्ततः ।