भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1153

महाबाहो! तत्पश्चात् मैंने भी शीघ्रतापूर्वक ऐसे अस्त्रोंका प्रयोग आरम्भ किया, जो युद्धभूमिमें विपक्षीकी गतिको रोक देनेवाले थे। मेरे तथा परशुरामजीके बाण आकाशमें सब ओर फैलकर मध्यभागमें ही ठहर गये ।। ३१ १/२ ।।

न स्म सूर्यः प्रतपति शरजालसमावृतः ।। ३२ ।।
मातरिश्वा ततस्तस्मिन् मेघरुद्ध इवाभवत् ।
उस समय बाणोंके समूहसे आच्छादित होनेके कारण सूर्य नहीं तपता था और वायुकी गति इस प्रकार कुण्ठित हो गयी थी, मानो मेघोंसे अवरुद्ध हो गयी हो ।। ३२ १/२ ।।

ततो वायोः प्रकम्पाच्च सूर्यस्य च गभस्तिभिः ।। ३३ ।।
अभिघातप्रभावाच्च पावकः समजायत ।
उस समय वायुके कम्पन और सूर्यकी किरणोंसे समस्त बाण परस्पर टकराने लगे। उनकी रगड़से वहाँ आग प्रकट हो गयी ।। ३३ १/२ ।।

ते शराः स्वसमुत्थेन प्रदीप्ताश्चित्रभानुना ।। ३४ ।।
भूमौ सर्वे तदा राजन् भस्मभूताः प्रपेदिरे ।
राजन्! वे सभी बाण अपने ही संघर्षसे उत्पन्न हुई अग्निसे जलकर भस्म हो गये और भूमिपर गिर पड़े ।। ३४ १/२ ।।

तदा शतसहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च ।। ३५ ।।
अयुतान्यथ खर्वाणि निखर्वाणि च कौरव ।
रामः शराणां संक्रुद्धो मयि तूर्णं न्यपातयत् ।। ३६ ।।
कौरवनरेश! उस समय परशुरामजीने अत्यन्त क्रुद्ध होकर मेरे ऊपर तुरंत ही दस हजार, लाख, दस लाख, अर्बुद, खर्ब और निखर्ब बाणोंका प्रहार किया ।।

ततोऽहं तानपि रणे शरैराशीविषोपमैः ।
संछिद्य भूमौ नृपते पातयेयं नगानिव ।। ३७ ।।
नरेश्वर! तब मैंने रणभूमिमें विषधर सर्पके समान भयंकर सायकोंद्वारा उन सब बाणोंको वृक्षोंकी भाँति भूमिपर काट गिराया ।। ३७ ।।

एवं तदभवद् युद्धं तदा भरतसत्तम ।
संध्याकाले व्यतीते तु व्यपायात् स च मे गुरुः ।। ३८ ।।
भरतभूषण! इस प्रकार वह युद्ध चलता रहा। संध्याकाल बीतनेपर मेरे गुरु रणभूमिसे हट गये ।। ३८ ।।

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि रामभीष्मयुद्धे
अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें परशुराम-भीष्मयुद्धविषयक एक सौ असीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८० ।।