महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
महाबाहो! तत्पश्चात् मैंने भी शीघ्रतापूर्वक ऐसे अस्त्रोंका प्रयोग आरम्भ किया, जो युद्धभूमिमें विपक्षीकी गतिको रोक देनेवाले थे। मेरे तथा परशुरामजीके बाण आकाशमें सब ओर फैलकर मध्यभागमें ही ठहर गये ।। ३१ १/२ ।।
न स्म सूर्यः प्रतपति शरजालसमावृतः ।। ३२ ।।
मातरिश्वा ततस्तस्मिन् मेघरुद्ध इवाभवत् ।
उस समय बाणोंके समूहसे आच्छादित होनेके कारण सूर्य नहीं तपता था और वायुकी गति इस प्रकार कुण्ठित हो गयी थी, मानो मेघोंसे अवरुद्ध हो गयी हो ।। ३२ १/२ ।।
ततो वायोः प्रकम्पाच्च सूर्यस्य च गभस्तिभिः ।। ३३ ।।
अभिघातप्रभावाच्च पावकः समजायत ।
उस समय वायुके कम्पन और सूर्यकी किरणोंसे समस्त बाण परस्पर टकराने लगे। उनकी रगड़से वहाँ आग प्रकट हो गयी ।। ३३ १/२ ।।
ते शराः स्वसमुत्थेन प्रदीप्ताश्चित्रभानुना ।। ३४ ।।
भूमौ सर्वे तदा राजन् भस्मभूताः प्रपेदिरे ।
राजन्! वे सभी बाण अपने ही संघर्षसे उत्पन्न हुई अग्निसे जलकर भस्म हो गये और भूमिपर गिर पड़े ।। ३४ १/२ ।।
तदा शतसहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च ।। ३५ ।।
अयुतान्यथ खर्वाणि निखर्वाणि च कौरव ।
रामः शराणां संक्रुद्धो मयि तूर्णं न्यपातयत् ।। ३६ ।।
कौरवनरेश! उस समय परशुरामजीने अत्यन्त क्रुद्ध होकर मेरे ऊपर तुरंत ही दस हजार, लाख, दस लाख, अर्बुद, खर्ब और निखर्ब बाणोंका प्रहार किया ।।
ततोऽहं तानपि रणे शरैराशीविषोपमैः ।
संछिद्य भूमौ नृपते पातयेयं नगानिव ।। ३७ ।।
नरेश्वर! तब मैंने रणभूमिमें विषधर सर्पके समान भयंकर सायकोंद्वारा उन सब बाणोंको वृक्षोंकी भाँति भूमिपर काट गिराया ।। ३७ ।।
एवं तदभवद् युद्धं तदा भरतसत्तम ।
संध्याकाले व्यतीते तु व्यपायात् स च मे गुरुः ।। ३८ ।।
भरतभूषण! इस प्रकार वह युद्ध चलता रहा। संध्याकाल बीतनेपर मेरे गुरु रणभूमिसे हट गये ।। ३८ ।।
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि रामभीष्मयुद्धे
अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें परशुराम-भीष्मयुद्धविषयक एक सौ असीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८० ।।
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१८१-
एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
भीष्म और परशुरामका युद्ध
भीष्म उवाच
समागतस्य रामेण पुनरेवातिदारुणम् ।
अन्येद्युस्तुमुलं युद्धं तदा भरतसत्तम ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ! दूसरे दिन परशुरामजीके साथ भेंट होनेपर पुनः अत्यन्त भयंकर युद्ध प्रारम्भ हुआ ॥ १ ॥
ततो दिव्यास्त्रविच्छूरो दिव्यान्यस्त्राण्यनेकशः ।
अयोजयत् स धर्मात्मा दिवसे दिवसे विभुः ॥ २ ॥
फिर तो दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता, शूरवीर एवं धर्मात्मा भगवान् परशुरामजी प्रतिदिन अनेक प्रकारके अलौकिक अस्त्रोंका प्रयोग करने लगे ॥ २ ॥
तान्यहं तत्प्रतीघातैरस्त्रैरस्त्राणि भारत ।
व्यधमं तुमुले युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा सुदुस्त्यजान् ॥ ३ ॥
भारत! उस तुमुल युद्धमें अपने दुस्त्यज प्राणोंकी परवा न करके मैंने उनके सभी अस्त्रोंका विघातक अस्त्रोंद्वारा संहार कर डाला ॥ ३ ॥
अस्त्रैरस्त्रेषु बहुधा हतेष्वेव च भारत ।
अक्रुध्यत महातेजास्त्यक्तप्राणः स संयुगे ॥ ४ ॥
भरतनन्दन! इस प्रकार बार-बार मेरे अस्त्रोंद्वारा अपने अस्त्रोंके विनष्ट होनेपर महातेजस्वी परशुरामजी उस युद्धमें प्राणोंका मोह छोड़कर अत्यन्त कुपित हो उठे ॥ ४ ॥
ततः शक्तिं प्राहिणोद् घोररूपा-
मस्त्रे रुद्धे जामदग्न्यो महात्मा ।
कालोत्सृष्टां प्रज्वलितामिवोल्कां
संदीप्ताग्रां तेजसा व्याप्य लोकम् ॥ ५ ॥
इस प्रकार अपने अस्त्रोंका अवरोध होनेपर जमदग्निनन्दन महात्मा परशुरामने कालकी छोड़ी हुई प्रज्वलित उल्काके समान एक भयंकर शक्ति छोड़ी, जिसका अग्रभाग उद्दीप्त हो रहा था। वह शक्ति अपने तेजसे सम्पूर्ण लोकको व्याप्त किये हुए थी ॥ ५ ॥
ततोऽहं तामिषुभिर्दीप्यमानां
समायान्तीमन्तकालार्कदीप्ताम् ।
छित्त्वा त्रिधा पातयामास भूमौ
ततो ववौ पवनः पुण्यगन्धिः ॥ ६ ॥
तब मैंने प्रलयकालके सूर्यकी भाँति प्रज्वलित होनेवाली उस देदीप्यमान शक्तिको अपनी ओर आती देख अनेक बाणोंद्वारा उसके तीन टुकड़े करके उसे भूमिपर गिरा दिया। फिर तो पवित्र सुगन्धसे युक्त मन्द-मन्द वायु चलने लगी ॥ ६ ॥
तस्यां छिन्नायां क्रोधदीप्तोऽथ रामः
शक्तीर्घोराः प्राहिणोद् द्वादशान्याः ।
तासां रूपं भारत नोत शक्यं
तेजस्वित्वाल्लाघवाच्चैव वक्तुम् ॥ ७ ॥
उस शक्तिके कट जानेपर परशुरामजी क्रोधसे जल उठे तथा उन्होंने दूसरी-दूसरी भयंकर बारह शक्तियाँ और छोड़ीं। भारत! वे इतनी तेजस्विनी तथा शीघ्रगामिनी थीं कि उनके स्वरूपका वर्णन करना असम्भव है ॥ ७ ॥
किं त्वेवाहं विह्वलः सम्प्रदृश्य
दिग्भ्यः सर्वास्ता महोल्का इवाग्नेः ।
नानारूपास्तेजसोग्रेण दीप्ता
यथाऽऽदित्या द्वादश लोकसंक्षये ॥ ८ ॥
प्रलयकालके बारह सूर्योंके समान भयंकर तेजसे प्रज्वलित अनेक रूपवाली तथा अग्निकी प्रचण्ड ज्वालाओंके समान धधकती हुई उन शक्तियोंको सब ओरसे आती देख मैं अत्यन्त विह्वल हो गया ॥ ८ ॥
ततो जालं बाणमयं विवृत्तं
संदृश्य भित्त्वा शरजालेन राजन् ।
द्वादशेषून् प्राहिणवं रणेऽहं
ततः शक्तीरप्यधमं घोररूपाः ॥ ९ ॥
राजन्! तत्पश्चात् वहाँ फैले हुए बाणमय जालको देखकर मैंने अपने बाणसमूहोंसे उसे छिन्न-भिन्न कर डाला और उस रणभूमिमें बारह सायकोंका प्रयोग किया, जिनसे उन भयंकर शक्तियोंको भी व्यर्थ कर दिया ॥
ततो राजञ्जामदग्न्यो महात्मा
शक्तीर्घोरा व्याक्षिपद्धेमदण्डाः ।
विचित्रिताः काञ्चनपट्टनद्धा
यथा महोल्का ज्वलितास्तथा ताः ॥ १० ॥
राजन्! तत्पश्चात् महात्मा जमदग्निनन्दन परशुरामने स्वर्णमय दण्डसे विभूषित और भी बहुत-सी भयानक शक्तियाँ चलायीं, जो विचित्र दिखायी देती थीं, उनके ऊपर सोनेके पत्र जड़े हुए थे और वे जलती हुई बड़ी-बड़ी उल्काओंके समान प्रतीत होती थीं ॥ १० ॥
ताश्चाप्युग्राश्श्रमणा वारयित्वा
खड्गेनाजौ पातयित्वा नरेन्द्र ।
बाणैर्दिव्यैर्जामदग्न्यस्य संख्ये दिव्यान्श्वानभ्यवर्षं ससूतान् ॥ ११ ॥ नरेन्द्र! उन भयंकर शक्तियोंको भी मैंने ढालसे रोककर तलवारसे रणभूमिमें काट गिराया। तत्पश्चात् परशुरामजीके दिव्य घोड़ों तथा सारथिपर मैंने दिव्य बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ११ ॥
निर्मुक्तानां पन्नगानां सरूपा दृष्ट्वा शक्तीर्हेमचित्रा निकृत्ताः । प्रादुश्चक्रे दिव्यमस्त्रं महात्मा क्रोधाविष्टो हैहयेशप्रमाथी ॥ १२ ॥ केंचुलीसे छूटकर निकले हुए सर्पोंके समान आकृतिवाली उन सुवर्णजटित विचित्र शक्तियोंको कटी हुई देख हैहयराजका विनाश करनेवाले महात्मा परशुरामजीने कुपित होकर पुनः अपना दिव्य अस्त्र प्रकट किया ॥ १२ ॥
ततः श्रेण्यः शलभानामिवोग्राः समापेतुर्विशिखानां प्रदीप्ताः । समाचिनोच्चापि भृशं शरीरं हयान् सूतं सरथं चैव मह्यम् ॥ १३ ॥ फिर तो टिड्डियोंकी पंक्तियोंके समान प्रज्वलित एवं भयंकर बाणोंके समूह प्रकट होने लगे। इस प्रकार उन्होंने मेरे शरीर, रथ, सारथि और घोड़ोंको सर्वथा आच्छादित कर दिया ॥ १३ ॥
रथः शरैर्मे निचितः सर्वतोऽभूत् तथा वाहाः सारथिश्चैव राजन् । युगं रथेषां च तथैव चक्रे तथैवाक्षः शरकृत्तोऽथ भग्नः ॥ १४ ॥ राजन्! मेरा रथ चारों ओरसे उनके बाणोंद्वारा व्याप्त हो रहा था। घोड़ों और सारथिकी भी यही दशा थी। युग तथा ईषादण्डको भी उन्होंने उसी प्रकार बाणविद्ध कर रखा था और रथका धुरा उनके बाणोंसे कटकर टूक-टूक हो गया था ॥ १४ ॥
ततस्तस्मिन् बाणवर्षे व्यतीते शरोघेण प्रत्यवर्षं गुरुं तम् । स विक्षतो मार्गणैर्ब्रह्मराशि- र्देहादसक्तं मुमुचे भूरि रक्तम् ॥ १५ ॥ जब उनकी बाण-वर्षा समाप्त हुई, तब मैंने भी बदलेमें गुरुदेवपर बाणसमूहोंकी बौछार आरम्भ कर दी। वे ब्रह्मराशि महात्मा मेरे बाणोंसे क्षत-विक्षत होकर अपने शरीरसे अधिकाधिक रक्तकी धारा बहाने लगे ॥ १५ ॥
यथा रामो बाणजालाभितप्त- स्तथैवाहं सुभृशं गाढविद्धः । ततो युद्धं व्यरमच्चापराह्ने भानावस्तं प्रति याते महीध्रम् ॥ १६ ॥
जिस प्रकार परशुरामजी मेरे सायकसमूहोंसे संतप्त थे, उसी प्रकार मैं भी उनके बाणोंसे अत्यन्त घायल हो रहा था। तदनन्तर सायंकालमें जब सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये, तब युद्ध बंद हो गया ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें एक सौ इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८१ ॥
१८२-
द्व्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
भीष्म और परशुरामका युद्ध
भीष्म उवाच
ततः प्रभाते राजेन्द्र सूर्ये विमलतां गते । भार्गवस्य मया सार्धं पुनर्युद्धमवर्तत ॥ १ ॥ भीष्मजी कहते हैं—राजेन्द्र! तदनन्तर प्रातःकाल जब सूर्यदेव उदित होकर प्रकाशमें आ गये, उस समय मेरे साथ परशुरामजीका युद्ध पुनः प्रारम्भ हुआ ॥ १ ॥
ततोऽभ्रान्ते रथे तिष्ठन् रामः प्रहरतां वरः । ववर्ष शरजालानि मयि मेघ इवाचले ॥ २ ॥ तत्पश्चात् योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामजी स्थिर रथपर खड़े हो जैसे मेघ पर्वतपर जलकी बौछार करता है, उसी प्रकार मेरे ऊपर बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे ॥ २ ॥
ततः सूतो मम सुहृच्छरवर्षेण ताडितः । अपयातो रथोपस्थान्मनो मम विषादयन् ॥ ३ ॥ उस समय मेरा प्रिय सुहृद् सारथि बाणवर्षासे पीड़ित हो मेरे मनको विषादमें डालता हुआ रथकी बैठकसे नीचे गिर गया ॥ ३ ॥
ततः सूतो ममात्यर्थं कश्मलं प्राविशन्महत् । पृथिव्यां च शराघातान्निपपात मुमोह च ॥ ४ ॥ मेरे सारथिको अत्यन्त मोह छा गया था। वह बाणोंके आघातसे पृथ्वीपर गिरा और अचेत हो गया ॥ ४ ॥
ततः सूतोऽजहात् प्राणान् रामबाणप्रपीडितः । मुहूर्तादिव राजेन्द्र मां च भीराविशत् तदा ॥ ५ ॥ राजेन्द्र! परशुरामजीके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण दो ही घड़ीमें सूतने प्राण त्याग दिये। उस समय मेरे मनमें बड़ा भय समा गया ॥ ५ ॥
ततः सूते हते तस्मिन् क्षिपतस्तस्य मे शरान् । प्रमत्तमनसो रामः प्राहिणोन्मृत्युसम्मितम् ॥ ६ ॥ उस सारथिके मारे जानेपर मैं असावधान मनसे परशुरामजीके बाणोंको काट रहा था! इतनेहीमें परशुरामजीने मुझपर मृत्युके समान भयंकर बाण छोड़ा ॥ ६ ॥
ततः सूतव्यसनिनं विप्लुतं मां स भार्गवः । शरेणाभ्यहनद् गाढं विकृष्य बलवद्धनुः ॥ ७ ॥ उस समय मैं सारथिकी मृत्युके कारण व्याकुल था तो भी भृगुनन्दन परशुरामने अपने सुदृढ़ धनुषको जोर-जोरसे खींचकर मुझपर बाणसे गहरा आघात किया ॥ ७ ॥
स मे भुजान्तरे राजन् निपत्य रुधिराशनः । मयैव सह राजेन्द्र जगाम वसुधातलम् ॥ ८ ॥ राजेन्द्र! वह रक्त पीनेवाला बाण मेरी दोनों भुजाओंके बीच (वक्षःस्थलमें) चोट पहुँचाकर मुझे साथ लिये-दिये पृथ्वीपर जा गिरा ॥ ८ ॥ मत्वा तु निहतं रामस्ततो मां भरतर्षभ । मेघवद् विननादोच्चैर्जहृषे च पुनः पुनः ॥ ९ ॥ भरतश्रेष्ठ! उस समय मुझे मारा गया जानकर परशुरामजी मेघके समान गम्भीर स्वरसे गर्जना करने लगे। उनके शरीरमें बार-बार हर्षजनित रोमांच होने लगा ॥ ९ ॥ तथा तु पतिते राजन् मयि रामो मुदा युतः । उदक्रोशन्महानादं सह तैरनुयायिभिः ॥ १० ॥ राजन्! इस प्रकार मेरे धराशायी होनेपर परशुरामजीको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने अपने अनुयायियोंके साथ महान् कोलाहल मचाया ॥ १० ॥ मम तत्राभवन् ये तु कुरवः पार्श्वतः स्थिताः । आगता अपि युद्धं तज्जनास्तत्र दिदृक्षवः । आर्तिं परमिकां जग्मुस्ते तदा पतिते मयि ॥ ११ ॥ वहाँ मेरे पार्श्वभागमें जो कुरुवंशी क्षत्रियगण खड़े थे तथा जो लोग वहाँ युद्ध देखनेकी इच्छासे आये थे, उन सबको मेरे गिर जानेपर बड़ा दुःख हुआ ॥ ११ ॥ ततोऽपश्यं पतितो राजसिंहं द्विजानष्टौ सूर्यहुताशनाभान् । ते मां समन्तात् परिवार्य तस्थुः स्वबाहुभिः परिधार्याजिमध्ये ॥ १२ ॥ राजसिंह! वहाँ गिरते समय मैंने देखा कि सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी आठ ब्राह्मण आये और संग्रामभूमिमें मुझे सब ओरसे घेरकर अपनी भुजाओंपर ही मेरे शरीरको धारण करके खड़े हो गये ॥ १२ ॥ रक्ष्यमाणश्च तैर्विप्रैर्नाहं भूमिमुपास्पृशम् । अन्तरिक्षे धृतो ह्यस्मि तैर्विप्रैर्बान्धवैरिव ॥ १३ ॥ उन ब्राह्मणोंसे सुरक्षित होनेके कारण मुझे धरतीका स्पर्श नहीं करना पड़ा। मेरे सगे भाई-बन्धुओंकी भाँति उन ब्राह्मणोंने मुझे आकाशमें ही रोक लिया था ॥ १३ ॥ श्वसन्निवान्तरिक्षे च जलबिन्दुभिरुक्षितः । ततस्ते ब्राह्मणा राजन्नब्रुवन् परिगृह्य माम् ॥ १४ ॥ राजन्! आकाशमें मैं साँस लेता-सा ठहर गया था। उस समय ब्राह्मणोंने मुझपर जलकी बूँदें छिड़क दीं। फिर वे मुझे पकड़कर बोले ॥ १४ ॥ मा भैरिति समं सर्वे स्वस्ति तेऽस्त्विति चासकृत् ।
ततस्तेषामहं वाग्भिस्तर्पितः सहसोत्थितः।
मातरं सरितां श्रेष्ठामपश्यं रथमास्थिताम्॥ १५॥
उन सबने एक साथ ही बार-बार कहा—'तुम्हारा कल्याण हो। तुम भयभीत न हो।' उनके वचनामृतोंसे तृप्त होकर मैं सहसा उठकर खड़ा हो गया और देखा, मेरे रथपर सारथिके स्थानमें सरिताओंमें श्रेष्ठ माता गंगा बैठी हुई हैं॥ १५॥
हयाश्च मे संगृहीतास्तयासन्
महानद्या संयति कौरवेन्द्र।
पादौ जनन्याः प्रतिगृह्य चाहं
तथा पितॄणां रथमभ्यरोहम्॥ १६॥
कौरवराज! उस युद्धमें महानदी माता गंगाने मेरे घोड़ोंकी बागडोर पकड़ रखी थी। तब मैं माताके चरणोंका स्पर्श करके और पितरोंके उद्देश्यसे भी मस्तक नवाकर उस रथपर जा बैठा॥ १६॥
ररक्ष सा मां सरथं हयांश्चोपस्कराणि च।
तामहं प्राञ्जलिर्भूत्वा पुनरेव व्यसर्जियम्॥ १७॥
माताने मेरे रथ, घोड़ों तथा अन्यान्य उपकरणोंकी रक्षा की। तब मैंने हाथ जोड़कर पुनः माताको विदा कर दिया॥ १७॥
ततोऽहं स्वयमुद्यम्य हयांस्तान् वातरंहसः।
अयुध्यं जामदग्न्येन निवृत्तेऽहनि भारत॥ १८॥
भारत! तदनन्तर स्वयं ही उन वायुके समान वेगशाली घोड़ोंको काबूमें करके मैं जमदग्निनन्दन परशुरामजीके साथ युद्ध करने लगा। उस समय दिन प्रायः समाप्त हो चला था॥ १८॥
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ वेगवन्तं महाबलम्।
अमुञ्चं समरे बाणं रामाय हृदयच्छिदम्॥ १९॥
भरतश्रेष्ठ! उस समरभूमिमें मैंने परशुरामजीकी ओर एक प्रबल एवं वेगवान् बाण चलाया, जो हृदयको विदीर्ण कर देनेवाला था॥ १९॥
ततो जगाम वसुधां मम बाणप्रपीडितः।
जानुभ्यां धनुरुत्सृज्य रामो मोहवशं गतः॥ २०॥
मेरे उस बाणसे अत्यन्त पीड़ित हो परशुरामजीने मूर्च्छाके वशीभूत होकर धनुष छोड़ धरतीपर घुटने टेक दिये॥ २०॥
ततस्तस्मिन् निपतिते रामे भूरिसहस्रदे।
आवव्रुर्जर्लदा व्योम क्षरन्तो रुधिरं बहु॥ २१॥
अनेक सहस्र ब्राह्मणोंको बहुत दान करनेवाले परशुरामजीके धराशायी होनेपर अधिकाधिक रक्तकी वर्षा करते हुए बादलोंने आकाशको ढक लिया॥ २१॥
उल्काश्च शतशः पेतुः सनिर्घाताः सकम्पनाः । अर्कं च सहसा दीप्तं स्वर्भानुरभिसंवृणोत् ॥ २२ ॥ बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान सैकड़ों उल्कापात होने लगे। भूकम्प आ गया। अपनी किरणोंसे उद्भासित होनेवाले सूर्यदेवको राहुने सब ओरसे सहसा घेर लिया ॥ २२ ॥
ववुश्च वाताः परुषाश्चलिता च वसुन्धरा । गृध्रा बलाश्च कङ्काश्च परिपेतुर्मुदा युताः ॥ २३ ॥ वायु तीव्र वेगसे बहने लगी, धरती डोलने लगी, गीध, कौवे और कंक प्रसन्नतापूर्वक सब ओर उड़ने लगे ॥ २३ ॥
दीप्तायां दिशि गोमायुर्दारुणं मुहुरुन्नदत् । अनाहता दुन्दुभयो विनेदुर्भृशनिःस्वनाः ॥ २४ ॥ दिशाओंमें दाह-सा होने लगा, गीदड़ बार-बार भयंकर बोली बोलने लगा, दुन्दुभियाँ बिना बजाये ही जोर-जोरसे बजने लगीं ॥ २४ ॥
एतदौत्पातिकं सर्वं घोरमासीद् भयंकरम् । विसंज्ञकल्पे धरणीं गते रामे महात्मनि ॥ २५ ॥ इस प्रकार महात्मा परशुरामके मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिरते ही ये समस्त उत्पातसूचक अत्यन्त भयंकर अपशकुन होने लगे ॥ २५ ॥
ततो वै सहसोत्थाय रामो मामभ्यवर्तत । पुनर्युद्धाय कौरव्य विह्वलः क्रोधमूर्च्छितः ॥ २६ ॥ कुरुनन्दन! इसी समय परशुरामजी सहसा उठकर क्रोधसे मूर्च्छित एवं विह्वल हो पुनः युद्धके लिये मेरे समीप आये ॥ २६ ॥
आददानो महाबाहुः कार्मुकं तालसंनिभम् । ततो मय्याददानं तं राममेव न्यवारयन् ॥ २७ ॥ महर्षयः कृपायुक्ताः क्रोधाविष्टोऽथ भार्गवः । स मेऽहरदमेयात्मा शरं कालानलोपमम् ॥ २८ ॥ परशुराम ताड़के समान विशाल धनुष लिये हुए थे। जब वे मेरे लिये बाण उठाने लगे, तब दयालु महर्षियोंने उन्हें रोक दिया। वह बाण कालाग्निके समान भयंकर था। अमेयस्वरूप भार्गवने कुपित होनेपर भी मुनियोंके कहनेसे उस बाणका उपसंहार कर लिया ॥
ततो रविर्मन्दमरीचिमण्डलो ** जगामास्तं पांसुपुञ्जावगूढः ।** निशाव्यगाहत सुखशीतमारुता ** ततो युद्धं प्रत्यवहारयावः ॥ २९ ॥**
तदनन्तर मन्द किरणोंके पुंजसे प्रकाशित सूर्यदेव युद्धभूमिकी उड़ती हुई धूलोंसे आच्छादित हो अस्ताचलको चले गये। रात्रि आ गयी और सुखद शीतल वायु चलने लगी। उस समय हम दोनोंने युद्ध समाप्त कर दिया ॥ २९ ॥
एवं राजन्नवहारो बभूव ततः पुनर्विमलेऽभूत् सुघोरम् । कल्यं कल्यं विंशतिं वै दिनानि तथैव चान्यानि दिनानि त्रीणि ॥ ३० ॥
राजन्! इस प्रकार प्रतिदिन संध्याके समय युद्ध बंद हो जाता और प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर पुनः अत्यन्त भयंकर संग्राम छिड़ जाता था। इस प्रकार हम दोनोंके युद्ध करते-करते तेईस दिन बीत गये ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि रामभीष्मयुद्धे द्व्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें परशुराम-भीष्मयुद्धविषयक एक सौ बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८२ ॥
१८३-
त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
भीष्मको अष्टवसुओंसे प्रस्वापनास्त्रकी प्राप्ति
भीष्म उवाच
ततोऽहं निशि राजेन्द्र प्रणम्य शिरसा तदा ।
ब्राह्मणानां पितॄणां च देवतानां च सर्वशः ॥ १ ॥
नक्तंचराणां भूतानां राजन्यानां विशाम्पते ।
शयनं प्राप्य रहिते मनसा समचिन्तयम् ॥ २ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजेन्द्र! तदनन्तर मैं रातके समय एकान्तमें शय्यापर जाकर ब्राह्मणों, पितरों, देवताओं, निशाचरों, भूतों तथा राजर्षिगणोंको मस्तक झुकाकर प्रणाम करनेके पश्चात् मन-ही-मन इस प्रकार चिन्ता करने लगा ॥ १-२ ॥
जामदग्न्येन मे युद्धमिदं परमदारुणम् ।
अहानि च बहून्यद्य वर्तते सुमहात्ययम् ॥ ३ ॥
आज बहुत दिन हो गये, जमदग्निनन्दन परशुरामजीके साथ यह मेरा अत्यन्त भयंकर और महान् अनिष्टकारक युद्ध चल रहा है ॥ ३ ॥
न च रामं महावीर्यं शक्नोमि रणमूर्धनि ।
विजेतुं समरे विप्रं जामदग्न्यं महाबलम् ॥ ४ ॥
परंतु मैं महाबली, महापराक्रमी विप्रवर परशुरामजीको समरभूमिमें युद्धके मुहानेपर किसी तरह जीत नहीं सकता ॥ ४ ॥
यदि शक्यो मया जेतुं जामदग्न्यः प्रतापवान् ।
दैवतानि प्रसन्नानि दर्शयन्तु निशां मम ॥ ५ ॥
यदि प्रतापी जमदग्निकुमारको जीतना मेरे लिये सम्भव हो तो प्रसन्न हुए देवगण रात्रिमें मुझे दर्शन दें ॥ ५ ॥
ततो निशि च राजेन्द्र प्रसुप्तः शरविक्षतः ।
दक्षिणेनेह पार्श्वेन प्रभातसमये तदा ॥ ६ ॥
ततोऽहं विप्रमुख्यैस्तैर्यैरस्मि पतितो रथात् ।
उत्थापितो धृतश्चैव मा भैरिति च सान्वितः ॥ ७ ॥
त एव मां महाराज स्वप्नदर्शनमेत्य वै ।
परिवार्याब्रुवन् वाक्यं तन्निबोध कुरूद्वह ॥ ८ ॥
राजेन्द्र! ऐसी प्रार्थना करके बाणोंसे क्षत-विक्षत हुआ मैं रात्रिके अन्तमें प्रभातके समय दाहिनी करवटसे सो गया। महाराज! कुरुश्रेष्ठ! तत्पश्चात् जिन ब्राह्मणशिरोमणियोंने रथसे गिरनेपर मुझे थाम लिया और उठाया था तथा ‘डरो मत’ ऐसा कहकर सान्त्वना दी थी,
उन्हीं लोगोंने मुझे सपनेमें दर्शन दे मेरे चारों ओर खड़े होकर जो बात कही थी, उसे बताता हूँ, सुनो— ॥ ६–८ ॥ उत्तिष्ठ मा भैर्गाङ्गेय न भयं तेऽस्ति किंचन । रक्षामहे त्वां कौरव्य स्वशरीरं हि नो भवान् ॥ ९ ॥ ‘गाङ्गानन्दन! उठो! भयभीत न होओ। तुम्हें कोई भय नहीं है। कुरुनन्दन! हम तुम्हारी रक्षा करते हैं, क्योंकि तुम हमारे ही स्वरूप हो ॥ ९ ॥ न त्वां रामो रणे जेता जामदग्न्यः कथंचन । त्वमेव समरे रामं विजेतो भरतर्षभ ॥ १० ॥ ‘जमदग्निकुमार परशुराम तुम्हें किसी प्रकार युद्धमें जीत नहीं सकेंगे। भरतभूषण! तुम्हीं रणक्षेत्रमें परशुरामपर विजय पाओगे ॥ १० ॥ इदमस्त्रं सुदयितं प्रत्यभिज्ञास्यते भवान् । विदितं हि तवाप्येतत् पूर्वस्मिन् देहधारणे ॥ ११ ॥ प्राजापत्यं विश्वकृतं प्रस्वापं नाम भारत । न हीदं वेद रामोऽपि पृथिव्यां वा पुमान् क्वचित् ॥ १२ ॥ ‘भारत! यह प्रस्वाप नामक अस्त्र है, जिसके देवता प्रजापति हैं। विश्वकर्माने इसका आविष्कार किया है। यह तुम्हें भी परम प्रिय है। इसकी प्रयोगविधि तुम्हें स्वतः ज्ञात हो जायगी; क्योंकि पूर्वशरीरमें तुम्हें भी इसका पूर्ण ज्ञान था। परशुरामजी भी इस अस्त्रको नहीं जानते हैं। इस पृथ्वीपर कहीं किसी भी पुरुषको इसका ज्ञान नहीं है ॥ ११-१२ ॥ तत् स्मरस्व महाबाहो भृशं संयोजयस्व च । उपस्थास्यति राजेन्द्र स्वयमेव तवानघ ॥ १३ ॥ ‘महाबाहो! इस अस्त्रका स्मरण करो और विशेष-रूपसे इसीका प्रयोग करो। निष्पाप राजेन्द्र! यह अस्त्र स्वयं ही तुम्हारी सेवामें उपस्थित हो जायगा ॥ १३ ॥ येन सर्वान् महावीर्यान् प्रशासिष्यसि कौरव । न च रामः क्षयं गन्ता तेनास्त्रेण नराधिप ॥ १४ ॥ ‘कुरुनन्दन! उसके प्रभावसे तुम सम्पूर्ण महापराक्रमी नरेशोंपर शासन करोगे। राजन्! उस अस्त्रसे परशुरामका नाश नहीं होगा ॥ १४ ॥ एनसा न तु संयोगं प्राप्स्यसे जातु मानद । स्वप्स्यते जामदग्न्योऽसौ त्वद्बाणबलपीडितः ॥ १५ ॥ ‘इसलिये मानद! तुम्हें कभी इसके द्वारा पापसे संयोग नहीं होगा। तुम्हारे अस्त्रके प्रभावसे पीड़ित होकर जमदग्नि कुमार परशुराम चुपचाप सो जायँगे ॥ १५ ॥ ततो जित्वा त्वमेवैनं पुनरुत्थापयिष्यसि । अस्त्रेण दयितेनाजौ भीष्म सम्बोधनेन वै ॥ १६ ॥
‘भीष्म! तदनन्तर अपने उस प्रिय अस्त्रके द्वारा युद्धमें विजयी होकर तुम्हीं उन्हें सम्बोधनास्त्रद्वारा पुनः जगाकर उठाओगे ।। १६ ।। एवं कुरुष्व कौरव्य प्रभाते रथमास्थितः । प्रसुप्तं वा मृतं वेति तुल्यं मन्यामहे वयम् ।। १७ ।। ‘कुरुनन्दन! प्रातःकाल रथपर बैठकर तुम ऐसा ही करो; क्योंकि हमलोग सोये अथवा मरे हुएको समान ही समझते हैं ।। १७ ।। न च रामेण मर्तव्यं कदाचिदपि पार्थिव । ततः समुत्पन्नमिदं प्रस्वापं युज्यतामिति ।। १८ ।। ‘राजन्! परशुरामकी कभी मृत्यु नहीं हो सकती; अतः इस प्राप्त हुए प्रस्वाप नामक अस्त्रका प्रयोग करो’ ।। इत्युक्त्वान्तर्हिता राजन् सर्व एव द्विजोत्तमाः । अष्टौ सदृशरूपास्ते सर्वे भासुरमूर्तयः ।। १९ ।। राजन्! ऐसा कहकर वे वसुस्वरूप सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण अदृश्य हो गये। वे आठों समान रूपवाले थे। उन सबके शरीर तेजोमय प्रतीत होते थे ।। १९ ।।
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि भीष्मप्रस्वापनास्त्रलाभे त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८३ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें भीष्मको प्रस्वापनास्त्रका प्राप्तिविषयक एक सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८३ ।।
१८४-
चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
भीष्म तथा परशुरामजीका एक-दूसरेपर शक्ति और ब्रह्मास्त्रका प्रयोग
भीष्म उवाच
ततो रात्रौ व्यतीतायां प्रतिबुद्धोऽस्मि भारत ।
ततः संचिन्त्य वै स्वप्नमवापं हर्षमुत्तमम् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—भारत! तदनन्तर रात बीतनेपर जब मेरी नींद खुली, तब उस स्वप्नकी बातको सोचकर मुझे बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ ॥ १ ॥
ततः समभवद् युद्धं मम तस्य च भारत ।
तुमुलं सर्वभूतानां लोमहर्षणमद्भुतम् ॥ २ ॥
भारत! तदनन्तर मेरा और परशुरामजीका भयंकर युद्ध छिड़ गया, जो समस्त प्राणियोंके रोंगटे खड़े कर देनेवाला और अद्भुत था ॥ २ ॥
ततो बाणमयं वर्षं ववर्ष मयि भार्गवः ।
न्यवारयमहं तच्च शरजालेन भारत ॥ ३ ॥
उस समय भृगुनन्दन परशुरामजीने मुझपर बाणोंकी झड़ी लगा दी। भारत! तब मैंने अपने सायकसमूहोंसे उस बाणवर्षाको रोक दिया ॥ ३ ॥
ततः परमसंक्रुद्धः पुनरेव महातपाः ।
ह्यस्तनेन च कोपेन शक्तिं वै प्राहिणोन्मयि ॥ ४ ॥
तब महातपस्वी परशुराम पुनः मुझपर अत्यन्त कुपित हो गये। पहले दिनका भी कोप था ही। उससे प्रेरित होकर उन्होंने मेरे ऊपर शक्ति चलायी ॥ ४ ॥
इन्द्राशनिसमस्पर्शां यमदण्डसमप्रभाम् ।
ज्वलन्तीमग्निवत् संख्ये लेलिहानां समन्ततः ॥ ५ ॥
उसका स्पर्श इन्द्रके वज्रके समान भयंकर था। उसकी प्रभा यमदण्डके समान थी और उस संग्राममें अग्निके समान प्रज्वलित हुई वह शक्ति मानो सब ओरसे रक्त चाट रही थी ॥ ५ ॥
ततो भरतशार्दूल धिष्ण्यमाकाशगं यथा ।
स मामभ्यवधीत् तूर्णं जत्रुदेशे कुरूद्वह ॥ ६ ॥
भरतश्रेष्ठ! कुरुकुलरत्न! फिर आकाशवर्ती नक्षत्रके समान प्रकाशित होनेवाली उस शक्तिने तुरंत आकर मेरे गलेकी हँसलीपर आघात किया ॥ ६ ॥
अथास्रमस्रवद् घोरं गिरेर्गैरिकधातुवत् ।
रामेण सुमहाबाहो क्षतस्य छतजेक्षण ॥ ७ ॥
लाल नेत्रोंवाले महाबाहु दुर्योधन! परशुरामजीके द्वारा किये हुए उस गहरे आघातसे भयंकर रक्तकी धारा बह चली। मानो पर्वतसे गैरिक धातुमिश्रित जलका झरना झर रहा हो ॥ ७ ॥
ततोऽहं जामदग्न्याय भृशं क्रोधसमन्वितः ।
चिक्षेप मृत्युसंकाशं बाणं सर्पविषोपमम् ॥ ८ ॥
तब मैंने भी अत्यन्त कुपित हो सर्पविषके समान भयंकर मृत्युतुल्य बाण लेकर परशुरामजीके ऊपर चलाया ॥ ८ ॥
स तेनाभिहतो वीरो ललाटे द्विजसत्तमः ।
अशोभत महाराज सशृङ्ग इव पर्वतः ॥ ९ ॥
उस बाणने विप्रवर वीर परशुरामजीके ललाटमें चोट पहुँचायी। महाराज! उसके कारण वे शिखरयुक्त पर्वतके समान शोभा पाने लगे ॥ ९ ॥
स संरब्धः समावृत्य शरं कालान्तकोपमम् ।
संदधे बलवत् कृष्य घोरं शत्रुनिबर्हणम् ॥ १० ॥
तब उन्होंने भी रोषमें आकर काल और यमके समान भयंकर शत्रुनाशक बाणको हाथमें ले धनुषको बलपूर्वक खींचकर उसके ऊपर रखा ॥ १० ॥
स वक्षसि पपातोग्रः शरो व्याल इव श्वसन् ।
महीं राजंस्ततश्चाहमगमं रुधिराविलः ॥ ११ ॥
राजन्! उनका चलाया हुआ वह भयंकर बाण फुफकारते हुए सर्पके समान सनसनाता हुआ मेरी छातीपर आकर लगा। उससे लहूलुहान होकर मैं पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ११ ॥
सम्प्राप्य तु पुनः संज्ञां जामदग्न्याय धीमते ।
प्राहिण्वं विमलां शक्तिं ज्वलन्तीमशनीमिव ॥ १२ ॥
पुनः चेतमें आनेपर मैंने बुद्धिमान् परशुरामजीके ऊपर प्रज्वलित वज्रके समान एक उज्ज्वल शक्ति चलायी ॥ १२ ॥
सा तस्य द्विजमुख्यस्य निपपात भुजान्तरे ।
विह्वलश्चाभवद् राजन् वेपथुश्चैनमाविशत् ॥ १३ ॥
वह शक्ति उन ब्राह्मणशिरोमणिकी दोनों भुजाओंके ठीक बीचमें जाकर लगी। राजन्! इससे वे विह्वल हो गये और उनके शरीरमें कँपकँपी आ गयी ॥ १३ ॥
तत एनं परिष्वज्य सखा विप्रो महातपाः ।
अकृतव्रणः शुभैर्वाक्यैराश्वासयदनेकधा ॥ १४ ॥
तब उनके महातपस्वी मित्र अकृतव्रणने उन्हें हृदयसे लगाकर सुन्दर वचनोंद्वारा अनेक प्रकारसे आश्वासन दिया ॥ १४ ॥
समाश्र्वस्तस्ततो रामः क्रोधामर्षसमन्वितः ।
प्रादुश्चक्रे तदा ब्राह्मं परमास्त्रं महाव्रतः ॥ १५ ॥
तदनन्तर महाव्रती परशुरामजी धैर्ययुक्त हो क्रोध और अमर्षमें भर गये और उन्होंने परम उत्तम ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया ॥ १५ ॥
ततस्तत्प्रतिघातार्थं ब्राह्ममेवास्त्रमुत्तमम् ।
मया प्रयुक्तं जज्वाल युगान्तमिव दर्शयत् ॥ १६ ॥
तब उस अस्त्रका निवारण करनेके लिये मैंने भी उत्तम ब्रह्मास्त्रका ही प्रयोग किया। मेरा वह अस्त्र प्रलयकालका-सा दृश्य उपस्थित करता हुआ प्रज्वलित हो उठा ॥ १६ ॥
तयोर्ब्रह्मास्त्रयोरासीदन्तरा वै समागमः ।
असम्प्राप्यैव रामं च मां च भारतसत्तम ॥ १७ ॥
भरतवंशशिरोमणे! वे दोनों ब्रह्मास्त्र मेरे तथा परशुरामजीके पास न पहुँचकर बीचमें ही एक-दूसरेसे भिड़ गये ॥ १७ ॥
ततो व्योम्नि प्रादुरभूत् तेज एव हि केवलम् ।
भूतानि चैव सर्वाणि जग्मुरार्तिं विशाम्पते ॥ १८ ॥
प्रजानाथ! फिर तो आकाशमें केवल आगकी ही ज्वाला प्रकट होने लगी। इससे समस्त प्राणियोंको बड़ी पीड़ा हुई ॥ १८ ॥
ऋषयश्च सगन्धर्वा देवताश्चैव भारत ।
संतापं परमं जग्मुरस्त्रतेजोऽभिपीडिताः ॥ १९ ॥
भारत! उन ब्रह्मास्त्रोंके तेजसे पीड़ित होकर ऋषि, गन्धर्व तथा देवता भी अत्यन्त संतप्त हो उठे ॥ १९ ॥
ततश्चचाल पृथिवी सपर्वतवनद्रुमा ।
संतप्तानि च भूतानि विषादं जग्मुरुत्तमम् ॥ २० ॥
फिर तो पर्वत, वन और वृक्षोंसहित सारी पृथ्वी डोलने लगी। भूतलके समस्त प्राणी संतप्त हो अत्यन्त विषाद करने लगे ॥ २० ॥
प्रजज्वाल नभो राजन् धूमायन्ते दिशो दश ।
न स्थातुमन्तरिक्षे च शेकुराकाशगास्तदा ॥ २१ ॥
राजन्! उस समय आकाश जल रहा था। सम्पूर्ण दिशाओंमें धूम व्याप्त हो रहा था। आकाशचारी प्राणी भी आकाशमें ठहर न सके ॥ २१ ॥
ततो हाहाकृते लोके सदेवासुरराक्षसे ।
इदमन्तरमित्येवं मोक्तुकामोऽस्मि भारत ॥ २२ ॥
प्रस्वापमस्त्रं त्वरितो वचनाद् ब्रह्मवादिनाम् ।
विचित्रं च तदस्त्रं मे मनसि प्रत्यभात् तदा ॥ २३ ॥
तदनन्तर देवता, असुर तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण जगत्में हाहाकार मच गया। भारत! 'यही उपयुक्त अवसर है' ऐसा मानकर मैंने तुरंत ही प्रस्वापनास्त्रको छोड़नेका विचार
किया। फिर तो उन ब्रह्मवादी वसुओंके कथनानुसार उस विचित्र अस्त्रका मेरे मनमें स्मरण हो आया।।
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि परस्परब्रह्मास्त्रप्रयोगे चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें परस्पर ब्रह्मास्त्रप्रयोगविषयक एक सौ चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८४ ।।
१८५-
पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
देवताओंके मना करनेसे भीष्मका प्रस्वापनास्त्रको प्रयोगमें न लाना तथा पितर, देवता और गंगाके आग्रहसे भीष्म और परशुरामके युद्धकी समाप्ति
भीष्म उवाच
ततो हलहलाशब्दो दिवि राजन् महानभूत् ।
प्रस्वापं भीष्म मा स्राक्षीरिति कौरवनन्दन ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! कौरवनन्दन! तदनन्तर ‘भीष्म! प्रस्वापनास्त्रका प्रयोग न करो’ इस प्रकार आकाशमें महान् कोलाहल मच गया ॥ १ ॥
अयुञ्जमेव चैवाहं तदस्त्रं भृगुनन्दने ।
प्रस्वापं मां प्रयुञ्जानं नारदो वाक्यमब्रवीत् ॥ २ ॥
तथापि मैंने भृगुनन्दन परशुरामजीको लक्ष्य करके उस अस्त्रको धनुषपर चढ़ा ही लिया। मुझे प्रस्वापनास्त्रका प्रयोग करते देख नारदजीने इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥
एते वियति कौरव्य दिवि देवगणाः स्थिताः ।
ते त्वां निवारयन्त्यद्य प्रस्वापं मा प्रयोजय ॥ ३ ॥
‘कुरुनन्दन! ये आकाशमें स्वर्गलोकके देवता खड़े हैं। ये सब-के-सब इस समय तुम्हें मना कर रहे हैं, तुम प्रस्वापनास्त्रका प्रयोग न करो ॥ ३ ॥
रामस्तपस्वी ब्रह्मण्यो ब्राह्मणश्च गुरुश्च ते ।
तस्यावमानं कौरव्य मा स्म कार्षीः कथंचन ॥ ४ ॥
‘परशुरामजी तपस्वी, ब्राह्मणभक्त, ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण और तुम्हारे गुरु हैं। कुरुकुलरत्न! तुम किसी तरह भी उनका अपमान न करो’ ॥ ४ ॥
ततोऽपश्यं दिविष्ठान् वै तानष्टौ ब्रह्मवादिनः ।
ते मां स्मयन्तो राजेन्द्र शनकैरिदमब्रुवन् ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! तत्पश्चात् मैंने आकाशमें खड़े हुए उन आठों ब्रह्मवादी वसुओंको देखा। वे मुसकराते हुए मुझसे धीरे-धीरे इस प्रकार बोले— ॥ ५ ॥
यथाऽऽह भरतश्रेष्ठ नारदस्तत् तथा कुरु ।
एतद्धि परमं श्रेयो लोकानां भरतर्षभ ॥ ६ ॥
‘भरतश्रेष्ठ! नारदजी जैसा कहते हैं, वैसा करो। भरतकुलतिलक! यही सम्पूर्ण जगत्के लिये परम कल्याणकारी होगा’ ॥ ६ ॥
ततश्च प्रतिसंहृत्य तदस्त्रं स्वापनं महत् ।
ब्रह्मास्त्रं दीपयांचक्रे तस्मिन् युधि यथाविधि ॥ ७ ॥
तब मैंने उस महान् प्रस्वापनास्त्रको धनुषसे उतार लिया और उस युद्धमें विधिपूर्वक ब्रह्मास्त्रको ही प्रकाशित किया ॥ ७ ॥
ततो रामो हृषितो राजसिंह
दृष्ट्वा तदस्त्रं विनिवर्तितं वै ।
जितोऽस्मि भीष्मेण सुमन्दबुद्धि-
रित्येव वाक्यं सहसा व्यमुञ्चत् ॥ ८ ॥
राजसिंह! मैंने प्रस्वापनास्त्रको उतार लिया है—यह देखकर परशुरामजी बड़े प्रसन्न हुए। उनके मुखसे सहसा यह वाक्य निकल पड़ा कि 'मुझ मन्दबुद्धिको भीष्मने जीत लिया' ॥ ८ ॥
ततोऽपश्यत् पितरं जामदग्न्यः
पितुस्तथा पितरं चास्य मान्यम् ।
ते तत्र चैनं परिवार्य तस्थु-
रूचुश्चैनं सान्त्वपूर्वं तदानीम् ॥ ९ ॥
इसके बाद जमदग्निकुमार परशुरामने अपने पिता जमदग्निको तथा उनके भी माननीय पिता ऋचीक मुनिको देखा। वे सब पितर उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये और उस समय उन्हें सान्त्वना देते हुए बोले ॥ ९ ॥
पितर ऊचुः
मा स्मैवं साहसं तात पुनः कार्षीः कथंचन ।
भीष्मेण संयुगं गन्तुं क्षत्रियेण विशेषतः ॥ १० ॥
**पितरोंने कहा—**तात! फिर कभी किसी प्रकार भी ऐसा साहस न करना। भीष्म और विशेषतः क्षत्रियके साथ युद्धभूमिमें उतरना अब तुम्हारे लिये उचित नहीं है ॥ १० ॥
क्षत्रियस्य तु धर्मोऽयं यद् युद्धं भृगुनन्दन ।
स्वाध्यायो व्रतचर्याथ ब्राह्मणानां परं धनम् ॥ ११ ॥
भृगुनन्दन! क्षत्रियका तो युद्ध करना धर्म ही है; किंतु ब्राह्मणोंके लिये वेदोंका स्वाध्याय तथा उत्तम व्रतोंका पालन ही परम धर्म है ॥ ११ ॥
इदं निमित्ते कस्मिंश्चिदस्माभिः प्रागुदाहृतम् ।
शस्त्रधारणमत्युग्रं तच्चाकार्यं कृतं त्वया ॥ १२ ॥
यह बात पहले भी किसी अवसरपर हमने तुमसे कही थी। शस्त्र उठाना अत्यन्त भयंकर कर्म है; अतः तुमने यह न करनेयोग्य कार्य ही किया है ॥ १२ ॥
वत्स पर्याप्तमेतावद् भीष्मेण सह संयुगे ।
विमर्दस्ते महाबाहो व्यपयाहि रणादितः ॥ १३ ॥