भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1165

उन्हीं लोगोंने मुझे सपनेमें दर्शन दे मेरे चारों ओर खड़े होकर जो बात कही थी, उसे बताता हूँ, सुनो— ॥ ६–८ ॥ उत्तिष्ठ मा भैर्गाङ्गेय न भयं तेऽस्ति किंचन । रक्षामहे त्वां कौरव्य स्वशरीरं हि नो भवान् ॥ ९ ॥ ‘गाङ्गानन्दन! उठो! भयभीत न होओ। तुम्हें कोई भय नहीं है। कुरुनन्दन! हम तुम्हारी रक्षा करते हैं, क्योंकि तुम हमारे ही स्वरूप हो ॥ ९ ॥ न त्वां रामो रणे जेता जामदग्न्यः कथंचन । त्वमेव समरे रामं विजेतो भरतर्षभ ॥ १० ॥ ‘जमदग्निकुमार परशुराम तुम्हें किसी प्रकार युद्धमें जीत नहीं सकेंगे। भरतभूषण! तुम्हीं रणक्षेत्रमें परशुरामपर विजय पाओगे ॥ १० ॥ इदमस्त्रं सुदयितं प्रत्यभिज्ञास्यते भवान् । विदितं हि तवाप्येतत् पूर्वस्मिन् देहधारणे ॥ ११ ॥ प्राजापत्यं विश्वकृतं प्रस्वापं नाम भारत । न हीदं वेद रामोऽपि पृथिव्यां वा पुमान् क्वचित् ॥ १२ ॥ ‘भारत! यह प्रस्वाप नामक अस्त्र है, जिसके देवता प्रजापति हैं। विश्वकर्माने इसका आविष्कार किया है। यह तुम्हें भी परम प्रिय है। इसकी प्रयोगविधि तुम्हें स्वतः ज्ञात हो जायगी; क्योंकि पूर्वशरीरमें तुम्हें भी इसका पूर्ण ज्ञान था। परशुरामजी भी इस अस्त्रको नहीं जानते हैं। इस पृथ्वीपर कहीं किसी भी पुरुषको इसका ज्ञान नहीं है ॥ ११-१२ ॥ तत् स्मरस्व महाबाहो भृशं संयोजयस्व च । उपस्थास्यति राजेन्द्र स्वयमेव तवानघ ॥ १३ ॥ ‘महाबाहो! इस अस्त्रका स्मरण करो और विशेष-रूपसे इसीका प्रयोग करो। निष्पाप राजेन्द्र! यह अस्त्र स्वयं ही तुम्हारी सेवामें उपस्थित हो जायगा ॥ १३ ॥ येन सर्वान् महावीर्यान् प्रशासिष्यसि कौरव । न च रामः क्षयं गन्ता तेनास्त्रेण नराधिप ॥ १४ ॥ ‘कुरुनन्दन! उसके प्रभावसे तुम सम्पूर्ण महापराक्रमी नरेशोंपर शासन करोगे। राजन्! उस अस्त्रसे परशुरामका नाश नहीं होगा ॥ १४ ॥ एनसा न तु संयोगं प्राप्स्यसे जातु मानद । स्वप्स्यते जामदग्न्योऽसौ त्वद्बाणबलपीडितः ॥ १५ ॥ ‘इसलिये मानद! तुम्हें कभी इसके द्वारा पापसे संयोग नहीं होगा। तुम्हारे अस्त्रके प्रभावसे पीड़ित होकर जमदग्नि कुमार परशुराम चुपचाप सो जायँगे ॥ १५ ॥ ततो जित्वा त्वमेवैनं पुनरुत्थापयिष्यसि । अस्त्रेण दयितेनाजौ भीष्म सम्बोधनेन वै ॥ १६ ॥