भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1166

‘भीष्म! तदनन्तर अपने उस प्रिय अस्त्रके द्वारा युद्धमें विजयी होकर तुम्हीं उन्हें सम्बोधनास्त्रद्वारा पुनः जगाकर उठाओगे ।। १६ ।। एवं कुरुष्व कौरव्य प्रभाते रथमास्थितः । प्रसुप्तं वा मृतं वेति तुल्यं मन्यामहे वयम् ।। १७ ।। ‘कुरुनन्दन! प्रातःकाल रथपर बैठकर तुम ऐसा ही करो; क्योंकि हमलोग सोये अथवा मरे हुएको समान ही समझते हैं ।। १७ ।। न च रामेण मर्तव्यं कदाचिदपि पार्थिव । ततः समुत्पन्नमिदं प्रस्वापं युज्यतामिति ।। १८ ।। ‘राजन्! परशुरामकी कभी मृत्यु नहीं हो सकती; अतः इस प्राप्त हुए प्रस्वाप नामक अस्त्रका प्रयोग करो’ ।। इत्युक्त्वान्तर्हिता राजन् सर्व एव द्विजोत्तमाः । अष्टौ सदृशरूपास्ते सर्वे भासुरमूर्तयः ।। १९ ।। राजन्! ऐसा कहकर वे वसुस्वरूप सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण अदृश्य हो गये। वे आठों समान रूपवाले थे। उन सबके शरीर तेजोमय प्रतीत होते थे ।। १९ ।।

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि भीष्मप्रस्वापनास्त्रलाभे त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८३ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें भीष्मको प्रस्वापनास्त्रका प्राप्तिविषयक एक सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८३ ।।