महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह सुनकर यज्ञसेन द्रुपदने मन्त्रियोंको सब बातें ठीक-ठीक बता दीं। राजन्! तत्पश्चात् प्रजाकी रक्षाके लिये जैसी व्यवस्था उचित है, उसके लिये उन्होंने पुनः मन्त्रियोंके साथ गुप्त मन्त्रणा की ।। ५ ।।
सम्बन्धकं चैव समर्थ्य तस्मिन् दाशार्णके वै नृपतौ नरेन्द्र। स्वयं कृत्वा विप्रलम्भं यथाव- न्मन्त्रैकाग्रो निश्चयं वै जगाम ।। ६ ।।
नरेन्द्र! यद्यपि राजा द्रुपदने स्वयं ही वंचना की थी, तथापि दशार्णराजके साथ सम्बन्ध और प्रेम बनाये रखनेकी इच्छा करके एकाग्रचित्तसे मन्त्रणा करते हुए वे एक निश्चयपर पहुँच गये ।। ६ ।।
स्वभावगुप्तं नगरमापत्काले तु भारत। गोपयामास राजेन्द्र सर्वतः समलंकृतम् ।। ७ ।।
भरतनन्दन राजेन्द्र! यद्यपि वह नगर स्वभावसे ही सुरक्षित था, तथापि उस विपत्तिके समय उसको सब प्रकारसे सजा करके उन्होंने उसकी रक्षाके लिये विशेष व्यवस्था की ।। ७ ।।
आर्तिं च परमां राजा जगाम सह भार्यया। दशार्णपतिना सार्धं विरोधे भरतर्षभ ।। ८ ।।
भरतश्रेष्ठ! दशार्णराजके साथ विरोधकी भावना होनेपर रानीसहित राजा द्रुपदको बड़ा कष्ट हुआ ।। ८ ।।
कथं सम्बन्धिना सार्धं न मे स्याद् विग्रहो महान्। इति संचिन्त्य मनसा देवतामर्चयत् तदा ।। ९ ।।
अपने सम्बन्धीके साथ मेरा महान् युद्ध कैसे टल जाय—यह मन-ही-मन विचार करके उन्होंने देवताकी अर्चना आस्मभ कर दी ।। ९ ।।
तं तु दृष्ट्वा तदा राजन् देवी देवपरं तदा। अर्चां प्रयुञ्जानमथो भार्या वचनमब्रवीत् ।। १० ।।
राजन्! राजा द्रुपदको देवाराधनमें तत्पर देख महारानीने पूजा चढ़ाते हुए नरेशसे इस प्रकार कहा— ।। १० ।।
देवानां प्रतिपत्तिश्च सत्या साधुमता सदा। किमु दुःखार्णवं प्राप्य तस्मादर्चयतां गुरून् ।। ११ ।। दैवतानि च सर्वाणि पूज्यन्तां भूरिदक्षिणम्। अग्नयश्चापि हूयन्तां दाशार्णप्रतिषेधने ।। १२ ।।
‘देवताओंकी आराधना साधु पुरुषोंके लिये सदा ही सत्य (उत्तम) है। फिर जो दुःखके