भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1200

समुद्रमें डूबा हुआ हो, उसके लिये तो कहना ही क्या है। अतः आप गुरुजनों और सम्पूर्ण देवताओंका पूजन करें, ब्राह्मणोंको पर्याप्त दक्षिणा दें और दशार्णराजके लौट जानेके लिये अग्नियोंमें होम करें ।। ११-१२ ।। अयुद्धेन निवृत्तिं च मनसा चिन्तय प्रभो । देवतानां प्रसादेन सर्वमेतद् भविष्यति ।। १३ ।। 'प्रभो! मन-ही-मन यह चिन्तन कीजिये कि दशार्णराज बिना युद्ध किये ही लौट जायँ। देवताओंके कृपाप्रसादसे यह सब कुछ सिद्ध हो जायगा ।। १३ ।। मन्त्रिभिर्मन्त्रितं सार्धं त्वया पृथुलोचन । पुरस्यास्याविनाशाय यच्च राजंस्तथा कुरु ।। १४ ।। 'विशाललोचन नरेश! आपने इस नगरकी रक्षाके लिये मन्त्रियोंके साथ जैसा विचार किया है वैसा कीजिये ।। १४ ।। दैवं हि मानुषोपेतं भृशं सिद्ध्यति पार्थिव । परस्परविरोधाद्धि सिद्धिरस्ति न चैतयोः ।। १५ ।। 'भूपाल! पुरुषार्थसे संयुक्त होनेपर ही दैव विशेषरूपसे सिद्धिको प्राप्त होता है। दैव और पुरुषार्थमें परस्पर विरोध होनेपर इन दोनोंकी ही सिद्धि नहीं होती ।। १५ ।। तस्माद् विधाय नगरे विधानं सचिवैः सह । अर्चयस्व यथाकामं दैवतानि विशाम्पते ।। १६ ।। 'राजन्! अतः आप मन्त्रियोंके साथ नगरकी रक्षाके लिये आवश्यक व्यवस्था करके इच्छानुसार देवताओंकी अर्चना कीजिये' ।। १६ ।। एवं संभाषमाणौ तु दृष्ट्वा शोकपरायणौ । शिखण्डिनी तदा कन्या व्रीडितेव तपस्विनी ।। १७ ।। ततः सा चिन्तयामास मत्कृते दुःखितावुभौ । इमाविति ततश्चक्रे मतिं प्राणविनाशने ।। १८ ।। इन दोनोंको इस प्रकार शोकमग्न होकर बातचीत करते देख उनकी तपस्विनी पुत्री शिखण्डिनी लज्जित-सी होकर इस प्रकार चिन्ता करने लगी—'ये मेरे माता और पिता दोनों मेरे ही कारण दुःखी हो रहे हैं।' ऐसा सोचकर उसने प्राण त्याग देनेका विचार किया ।। १७-१८ ।। एवं सा निश्चयं कृत्वा भृशं शोकपरायणा । निर्जगाम गृहं त्यक्त्वा गहनं निर्जनं वनम् ।। १९ ।। इस प्रकार जीवनका अन्त कर देनेका निश्चय करके वह अत्यन्त शोकमग्न हो घर छोड़कर निर्जन एवं गहन वनमें चली गयी ।। १९ ।। यक्षेणर्द्धिमता राजन् स्थूणाकर्णेन पालितम् । तद्भयादेव च जनो विसर्जयति तद् वनम् ।। २० ।।