महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1210, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें‘यक्षो! शिखण्डीके मारे जानेपर यह स्थूणाकर्ण यक्ष अपना पूर्वरूप फिर प्राप्त कर लेगा। अतः अब इसे निर्भय हो जाना चाहिये।’ ऐसा कहकर महामना भगवान् यक्षराज कुबेर उन यक्षोंद्वारा अत्यन्त पूजित हो निमेषमात्रमें ही अभीष्ट स्थानपर पहुँच जानेवाले अपने समस्त सेवकोंके साथ वहाँसे चले गये ।। ५०-५१ ।। स्थूणस्तु शापं सम्प्राप्य तत्रैव न्यवसत् तदा । समये चागमत् तूर्णं शिखण्डी तं क्षपाचरम् ।। ५२ ।। उस समय कुबेरका शाप पाकर स्थूणाकर्ण वहीं रहने लगा। शिखण्डी पूर्वनिश्चित समयपर उस निशाचर स्थूणाकर्णके पास तुरंत आ गया ।। ५२ ।। सोऽभिगम्याब्रवीद् वाक्यं प्राप्तोऽस्मि भगवन्निति । तमब्रवीत् ततः स्थूणः प्रीतोऽस्मीति पुनः पुनः ।। ५३ ।। उसके निकट जाकर शिखण्डीने कहा—‘भगवन्! मैं आपकी सेवामें उपस्थित हूँ।’ तब स्थूणाकर्णने उससे बारंबार कहा—‘मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, बहुत प्रसन्न हूँ’ ।। आर्जवेनागतं दृष्ट्वा राजपुत्रं शिखण्डिनम् । सर्वमेव यथावृत्तमाचचक्षे शिखण्डिने ।। ५४ ।। राजकुमार शिखण्डीको सरलतापूर्वक आया हुआ देख उससे यक्षने अपना सारा वृत्तान्त ठीक-ठीक कह सुनाया ।। ५४ ।।
यक्ष उवाच शप्तो वैश्रवणेनाहं त्वत्कृते पार्थिवात्मज । गच्छेदानीं यथाकामं चर लोकान् यथासुखम् ।। ५५ ।। यक्षने कहा— राजकुमार! तुम्हारे लिये ही यक्षराजने मुझे शाप दे दिया है; अतः अब जाओ, इच्छानुसार सारे जगत्में सुखपूर्वक विचरो ।। ५५ ।। दिष्टमेतत् पुरा मन्ये न शक्यमतिवर्तितुम् । गमनं तव चेतो हि पौलस्त्यस्य च दर्शनम् ।। ५६ ।। मैं इसे अपना पुरातन प्रारब्ध ही मानता हूँ, जो कि तुम्हारा यहाँसे जाना और उसी समय यक्षराज कुबेरका यहाँ आकर दर्शन देना हुआ। अब इसे टाला नहीं जा सकता ।।
भीष्म उवाच एवमुक्तः शिखण्डी तु स्थूणयक्षेण भारत । प्रत्याजगाम नगरं हर्षेण महता वृतः ।। ५७ ।। भीष्म कहते हैं— भरतनन्दन! स्थूणाकर्ण यक्षके ऐसा कहनेपर शिखण्डी बड़े हर्षके साथ अपने नगरको लौट आया ।। ५७ ।। पूजयामास विविधैर्गन्धमाल्यैर्महाधनैः । द्विजातीन् देवतांश्चैव चैत्यानथ चतुष्पथान् ।। ५८ ।।