महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1211, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्रुपदः सह पुत्रेण सिद्धार्थेन शिखण्डिना । मुदं च परमां लेभे पाञ्चाल्यः सह बान्धवैः ॥ ५९ ॥ पूर्ण मनोरथ होकर लौटे हुए अपने पुत्र शिखण्डीके साथ पांचालराज द्रुपदने गन्ध-माल्य आदि नाना प्रकारके बहुमूल्य उपचारोंद्वारा देवताओं, ब्राह्मणों, चैत्य (पीपल आदि धार्मिक)-वृक्षों तथा चौराहोंका पूजन किया तथा बन्धु-बान्धवोंसहित उन्हें महान् हर्ष प्राप्त हुआ ॥
शिष्यार्थं प्रददौ चाथ द्रोणाय कुरुपुङ्गव । शिखण्डिनं महाराज पुत्रं स्त्रीपूर्विणं तथा ॥ ६० ॥ महाराज! कुरुश्रेष्ठ! द्रुपदने अपने पुत्र शिखण्डीको जो पहले कन्यारूपमें उत्पन्न हुआ था, द्रोणाचार्यकी सेवामें धनुर्वेदकी शिक्षाके लिये सौंप दिया ॥ ६० ॥
प्रतिपेदे चतुष्पादं धनुर्वेदं नृपात्मजः । शिखण्डी सह युष्माभिर्धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ ६१ ॥ इस प्रकार द्रुपदपुत्र शिखण्डी तथा धृष्टद्युम्नने तुम सब भाइयोंके साथ ही ग्रहण, धारण, प्रयोग और प्रतीकार—इन चार पादोंसे युक्त धनुर्वेदका अध्ययन किया ॥ ६१ ॥
मम त्वेतच्चरास्तात यथावत् प्रत्यवेदयन् । जडान्धबधिराकारा ये मुक्ता द्रुपदे मया ॥ ६२ ॥ मैंने द्रुपदके नगरमें कुछ गुप्तचर नियुक्त कर दिये थे, जो गूँगे, अंधे और बहरे बनकर वहाँ रहते थे। वे ही यह सब समाचार मुझे ठीक-ठीक बताया करते थे ॥ ६२ ॥
एवमेष महाराज स्त्रीपुमान् द्रुपदात्मजः । स सम्भूतः कुरुश्रेष्ठ शिखण्डी रथसत्तमः ॥ ६३ ॥ महाराज! कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार यह रथियोंमें उत्तम द्रुपदकुमार शिखण्डी पहले स्त्रीरूपमें उत्पन्न होकर पीछे पुरुष हुआ था ॥ ६३ ॥
ज्येष्ठा काशिपतेः कन्या अम्बानामेति विश्रुता । द्रुपदस्य कुले जाता शिखण्डी भरतर्षभ ॥ ६४ ॥ भरतश्रेष्ठ! काशिराजकी ज्येष्ठ कन्या, जो अम्बा नामसे विख्यात थी, वही द्रुपदके कुलमें शिखण्डीके रूपमें उत्पन्न हुई है ॥ ६४ ॥
नाहमेनं धनुष्पाणिं युयुत्सुं समुपस्थितम् । मुहूर्तमपि पश्येयं प्रहरेयं न चाप्युत ॥ ६५ ॥ जब यह हाथमें धनुष लेकर युद्ध करनेकी इच्छासे मेरे सामने उपस्थित होगा, उस समय मुहूर्तभर भी न तो इसकी ओर देखूँगा और न इसपर प्रहार ही करूँगा ॥ ६५ ॥
व्रतमेतन्मम सदा पृथिव्यामपि विश्रुतम् । स्त्रियां स्त्रीपूर्वके चैव स्त्रीनाम्नि स्त्रीसरूपिणि ॥ ६६ ॥ न मुञ्चेयमहं बाणमिति कौरवनन्दन ।