भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1212

कौरवनन्दन! इस भूमण्डलमें भी मेरा यह व्रत प्रसिद्ध है कि जो स्त्री हो, जो पहले स्त्री रहकर पुरुष हुआ हो, जिसका नाम स्त्रीके समान हो तथा जिसका रूप एवं वेष-भूषा स्त्रियोंके समान हो, इन सबपर मैं बाण नहीं छोड़ सकता ।। ६६ १/३ ।। न हन्यामहमेतेन कारणेन शिखण्डिनम् ।। ६७ ।। एतत् तत्त्वमहं वेद जन्म तात शिखण्डिनः । ततो नैनं हनिष्यामि समरेष्वाततायिनम् ।। ६८ ।। तात! इसी कारणसे मैं शिखण्डीको नहीं मार सकता। शिखण्डीके जन्मका वास्तविक वृत्तान्त मैं जानता हूँ। अतः समरभूमिमें वह आततायी होकर आवे तो भी मैं इसे नहीं मारूँगा ।। ६७-६८ ।। यदि भीष्मः स्त्रियं हन्यात् सन्तः कुर्युर्विगर्हणम् । नैनं तस्माद्धनिष्यामि दृष्ट्वापि समरे स्थितम् ।। ६९ ।। यदि भीष्म स्त्रीका वध करे तो साधु पुरुष इसकी निन्दा करेंगे, अतः शिखण्डीको समरभूमिमें खड़ा देखकर भी मैं इसे नहीं मारूँगा ।। ६९ ।।

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा तु कौरव्यो राजा दुर्योधनस्तदा । मुहूर्तमिव स ध्यात्वा भीष्मे युक्तममन्यत ।। ७० ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह सब सुनकर कुरुवंशी राजा दुर्योधनने दो घड़ीतक कुछ सोच-विचारकर भीष्मके लिये शिखण्डीका वध न करना उचित ही मान लिया ।। ७० ।।

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि शिखण्डिपुंस्त्वप्राप्तौ द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १९२ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें शिखण्डीको पुरुषत्व- प्राप्तिविषयक एक सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १९२ ।। [दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ७० १/३ श्लोक हैं।]