महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1219, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंन च द्रोणसुतो राजन् कुत एव तु सूतजः ॥ १४ ॥ ‘राजन्! इसे न तो गंगानन्दन भीष्म जानते हैं, न द्रोणाचार्य जानते हैं, न कृपाचार्य जानते हैं और न द्रोणपुत्र अश्वत्थामाको ही इसका पता है; फिर सूतपुत्र कर्ण तो इसे जान ही कैसे सकता है?’ ॥ १४ ॥
न तु युक्तं रणे हन्तुं दिव्यैरस्त्रैः पृथग्जनम् । आर्जवेनैव युद्धेन विजेष्यामो वयं परान् ॥ १५ ॥ ‘परंतु युद्धमें साधारण जनोंको दिव्यास्त्रोंद्वारा मारना कदापि उचित नहीं है; अतः हमलोग सरलतापूर्ण युद्धके द्वारा ही शत्रुओंको जीतेंगे ॥ १५ ॥
तथेमे पुरुषव्याघ्राः सहायास्तत्र पार्थिव । सर्वे दिव्यास्त्रविद्वांसः सर्वे युद्धाभिकाङ्क्षिणः ॥ १६ ॥ ‘राजन्! ये सभी पुरुषसिंह जो हमारे सहायक हैं, दिव्यास्त्रोंका ज्ञान रखते हैं और सभी युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले हैं ॥ १६ ॥
वेदान्तावभृथस्नाताः सर्व एतेऽपराजिताः । निहन्युः समरे सेनां देवानामपि पाण्डव ॥ १७ ॥ ‘इन सबने वेदाध्ययन समाप्त करके यज्ञान्त स्नान किया है। ये सभी कभी परास्त न होनेवाले वीर हैं। पाण्डुनन्दन! ये लोग समरभूमिमें देवताओंकी सेनाको भी नष्ट कर सकते हैं ॥ १७ ॥
शिखण्डी युयुधानश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । भीमसेनो यमौ चोभौ युधामन्युरुत्तमौजसौ ॥ १८ ॥ विराटद्रुपदौ चोभौ भीष्मद्रोणसमौ युधि । ‘शिखण्डी, सात्यकि, द्रुपदकुमार, धृष्टद्युम्न, भीमसेन, दोनों भाई नकुल-सहदेव, युधामन्यु, उत्तमौजा तथा राजा विराट और द्रुपद भी युद्धमें भीष्म और द्रोणाचार्यकी समानता करनेवाले हैं ॥ १८ ½ ॥
शङ्खश्चैव महाबाहुर्हैडिम्बश्च महाबलः ॥ १९ ॥ पुत्रोऽस्याञ्जनपर्वा तु महाबलपराक्रमः । शैनेयश्च महाबाहुः सहायो रणकोविदः ॥ २० ॥ ‘महाबाहु शंख, महाबली घटोत्कच, महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न घटोत्कचपुत्र अंजनपर्वा तथा संग्रामकुशल महाबाहु सात्यकि—ये सभी आपके सहायक हैं ॥ १९-२० ॥
अभिमन्युश्च बलवान् द्रौपद्याः पञ्च चात्मजाः । स्वयं चापि समर्थोऽसि त्रैलोक्योत्सादेऽपि च ॥ २१ ॥ ‘बलवान् अभिमन्यु और द्रौपदीके पाँचों पुत्र तो आपके साथ हैं ही। आप स्वयं भी तीनों लोकोंका संहार करनेमें समर्थ हैं ॥ २१ ॥