भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1227

सात्यकिश्च महेष्वासो वृष्णीनां प्रवरो रथः । वृतः शतसहस्रेण रथानां प्रणदन् बली ॥ २४ ॥ वृष्णिवंशके प्रमुख महारथी महान् धनुर्धर बलवान् सात्यकि एक लाख रथियोंसे घिरकर गर्जना करते हुए आगे बढ़ रहे थे ॥ २४ ॥ क्षत्रदेवब्रह्मदेवौ रथस्थौ पुरुषर्षभौ । जघनं पालयन्तौ च पृष्ठतोऽनुप्रजग्मतुः ॥ २५ ॥ क्षत्रदेव और ब्रह्मदेव ये दोनों पुरुषरत्न रथपर बैठकर सेनाके पिछले भागकी रक्षा करते हुए पीछे-पीछे जा रहे थे ॥ २५ ॥ शकटापणवेशांश्च यानं युग्यं च सर्वशः । तत्र नागसहस्राणि हयानामयुतानि च । फल्गु सर्वं कलत्रं च यत्किञ्चित् कृशदुर्बलम् ॥ २६ ॥ कोशसंचयवाहांश्च कोषागारं तथैव च । गजानीकेन संगृह्य शनैः प्रायाद् युधिष्ठिरः ॥ २७ ॥ इनके सिवा और भी बहुत-से छकड़े, दुकानें, वेश-भूषाके सामान, सवारियाँ, सामान ढोनेकी गाड़ी, एक सहस्र हाथी, अनेक अयुत घोड़े, अन्य छोटी-मोटी वस्तुएँ, स्त्रियाँ, कृश और दुर्बल मनुष्य, कोश-संग्रह और उनके ढोनेवाले लोग तथा कोषागार आदि सब कुछ संग्रह करके राजा युधिष्ठिर धीरे-धीरे गजसेनाके साथ यात्रा कर रहे थे ॥ २६-२७ ॥ तमन्वयात् सत्यधृतिः सौचित्तिर्युद्धदुर्मदः । श्रेणिमान् वसुदानश्च पुत्रः काश्यस्य वा विभुः ॥ २८ ॥ रथा विंशतिसाहस्रा ये तेषामनुयायिनः । हयानां दश कोट्यश्च महतां किंकिणीकिनाम् ॥ २९ ॥ गजा विंशतिसाहस्रा ईषादन्ताः प्रहारिणः । कुलीना भिन्नकरटा मेघा इव विसर्पिणः ॥ ३० ॥ उनके पीछे सुचित्तके पुत्र रणदुर्मद सत्यधृति, श्रेणिमान्, वसुदान तथा काशिराजके सामर्थ्यशाली पुत्र जा रहे थे। इन सबका अनुगमन करनेवाले बीस हजार रथी, घुँघुरुओंसे सुशोभित दस करोड़ घोड़े, ईषादण्डके समान दाँतवाले, प्रहारकुशल, अच्छी जातिमें उत्पन्न, मदस्रावी और मेघोंकी घटाके समान चलनेवाले बीस हजार हाथी थे ॥ षष्टिर्नागसहस्राणि दशान्यानि च भारत । युधिष्ठिरस्य यान्यासन् युधि सेना महात्मनः ॥ ३१ ॥ क्षरन्त इव जीमूताः प्रभिन्नकरटामुखाः । राजानमन्वयुः पश्चाच्चलन्त इव पर्वताः ॥ ३२ ॥ भारत! इनके सिवा, युद्धमें महात्मा युधिष्ठिरके पास निजी तौरपर सत्तर हजार हाथी और थे, जो जल बरसानेवाले बादलोंकी भाँति अपने गण्डस्थलसे मदकी धारा बहाते थे। वे