महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1230, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंकौरवाः समवर्तन्त जिगीषन्तो महाबलाः ॥ ३ ॥ सोमकोंसहित पाण्डव तथा कौरव दोनों महाबली थे। वे एक-दूसरेको जीतनेकी आशासे कुरुक्षेत्रमें उतरकर आमने-सामने डटे हुए थे ॥ ३ ॥
वेदाध्ययनसम्पन्नाः सर्वे युद्धाभिनन्दिनः । आशंसन्तो जयं युद्धे बलेनाभिमुखा रणे ॥ ४ ॥ वे सब-के-सब वेदाध्ययनसे सम्पन्न और युद्धका अभिनन्दन करनेवाले थे और संग्राममें विजयकी आशा रखकर रणभूमिमें बलपूर्वक एक-दूसरेके सम्मुख खड़े थे ॥ ४ ॥
अभियाय च दुर्धर्षा धार्तराष्ट्रस्य वाहिनीम् । प्राङ्मुखाः पश्चिमे भागे न्यविशन्त ससैनिकाः ॥ ५ ॥ पाण्डवोंके योद्धालोग अपने-अपने सैनिकोंके सहित धृतराष्ट्रपुत्रकी दुर्धर्ष सेनाके सम्मुख जाकर पश्चिमभागमें पूर्वाभिमुख होकर ठहर गये थे ॥ ५ ॥
समन्तपञ्चकाद् बाह्यं शिबिराणि सहस्रशः । कारयामास विधिवत् कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ६ ॥ कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने समन्तपंचकक्षेत्रसे बाहर यथायोग्य सहस्रों शिविर बनवाये थे ॥ ६ ॥
शून्या च पृथिवी सर्वा बालवृद्धावशेषिता । निरश्वपुरुषेवासीद् रथकुञ्जरवर्जिता ॥ ७ ॥ समस्त पृथ्वीके सभी प्रदेश नवयुवकोंसे सूने हो रहे थे। उनमें केवल बालक और वृद्ध ही शेष रह गये थे। सारी वसुधा घोड़े, हाथी, रथ और तरुण पुरुषोंसे हीन-सी हो रही थी ॥ ७ ॥
यावत्तपति सूर्यो हि जम्बूद्वीपस्य मण्डलम् । तावदेव समायातं बलं पार्थिवसत्तम ॥ ८ ॥ नृपश्रेष्ठ! सूर्यदेव जम्बूद्वीपके जितने भूमण्डलको अपनी किरणोंसे तपाते हैं, उतनी दूरकी सेनाएँ वहाँ युद्धके लिये आ गयी थीं ॥ ८ ॥
एकस्थाः सर्ववर्णास्ते मण्डलं बहुयोजनम् । पर्याक्रामन्त देशांश्च नदीः शैलान् वनानि च ॥ ९ ॥ वहाँ सभी वर्णके लोग एक ही स्थानपर एकत्र थे। युद्धभूमिका घेरा कई योजन लंबा था। उन सब लोगोंने वहाँके अनेक प्रदेशों, नदियों, पर्वतों और वनोंको सब ओरसे घेर लिया था ॥ ९ ॥
तेषां युधिष्ठिरो राजा सर्वेषां पुरुषर्षभ । व्यादिदेश सवाह्यानां भक्ष्यभोज्यमनुत्तमम् ॥ १० ॥ नरश्रेष्ठ! राजा युधिष्ठिरने सेना और सवारियों-सहित उन सबके लिये उत्तमोत्तम भोजन प्रस्तुत करनेका आदेश दे दिया था ॥ १० ॥