महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1231, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंशय्याश्च विविधास्तात तेषां रात्रौ युधिष्ठिरः । एवंवेदी वेदितव्यः पाण्डवेयोऽयमित्युत ॥ ११ ॥ अभिज्ञानानि सर्वेषां संज्ञाश्चाभरणानि च । योजयामास कौरव्यो युद्धकाल उपस्थिते ॥ १२ ॥ तात! रातके समय युधिष्ठिरने उन सबके सोनेके लिये नाना प्रकारकी शय्याओंका भी प्रबन्ध कर दिया था। युद्धकाल उपस्थित होनेपर कुरुनन्दन युधिष्ठिरने सभी सैनिकोंके पहचानके लिये उन्हें भिन्न-भिन्न प्रकारके संकेत और आभूषण दे दिये थे, जिससे यह जान पड़े कि यह पाण्डवपक्षका सैनिक है ॥ ११-१२ ॥ दृष्ट्वा ध्वजाग्रं पार्थस्य धार्तराष्ट्रो महामनाः । सह सर्वैर्महीपालैः प्रत्यव्यूहत पाण्डवम् ॥ १३ ॥ कुन्तीपुत्र अर्जुनके ध्वजका अग्रभाग देखकर महामना दुर्योधनने समस्त भूपालोंके साथ पाण्डव-सेनाके विरुद्ध अपनी सेनाकी व्यूहरचना की ॥ १३ ॥ पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि । मध्ये नागसहस्रस्य भ्रातृभिः परिवारितः ॥ १४ ॥ उसके मस्तकपर श्वेत छत्र तना हुआ था। वह एक हजार हाथियोंके बीचमें अपने भाइयोंसे घिरा हुआ शोभा पाता था ॥ १४ ॥ दृष्ट्वा दुर्योधनं हृष्टाः पञ्चाला युद्धनन्दिनः । दध्मुः प्रीता महाशङ्खान् भेर्यश्च मधुरस्वनाः ॥ १५ ॥ दुर्योधनको देखकर युद्धका अभिनन्दन करनेवाले पांचाल सैनिक बहुत प्रसन्न हुए और प्रसन्नतापूर्वक बड़े-बड़े शंखों तथा मधुर ध्वनि करनेवाली भेरियोंको बजाने लगे ॥ १५ ॥ ततः प्रहृष्टां तां सेनामभिवीक्ष्याथ पाण्डवाः । बभूवुर्हृष्टमनसो वासुदेवश्च वीर्यवान् ॥ १६ ॥ तदनन्तर अपनी सेनाको हर्ष और उल्लासमें भरी हुई देख समस्त पाण्डवोंके मनमें बड़ा हर्ष हुआ तथा पराक्रमी वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण भी संतुष्ट हुए ॥ १६ ॥ ततो हर्षं समागम्य वासुदेवधनंजयौ । दध्मतुः पुरुषव्याघ्रौ दिव्यौ शङ्खौ रथे स्थितौ ॥ १७ ॥ उस समय एक ही रथपर बैठे हुए पुरुषसिंह श्रीकृष्ण और अर्जुन आनन्दमग्न होकर अपने दिव्य शंखोंको बजाने लगे ॥ १७ ॥ पाञ्चजन्यस्य निर्घोषं देवदत्तस्य चोभयोः । श्रुत्वा तु निनदं योधाः शकृन्मूत्रं प्रसुस्रुवुः ॥ १८ ॥ पांचजन्य और देवदत्त दोनों शंखोंकी ध्वनि सुनकर शत्रुपक्षके बहुत-से सैनिक भयके मारे मल-मूत्र करने लगे ॥ १८ ॥ यथा सिंहस्य नदतः स्वनं श्रुत्वेतरे मृगाः ।