भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1236

धृतराष्ट्र उवाच न रोचये ज्ञातिवधं द्रष्टुं ब्रह्मर्षिसत्तम । युद्धमेतत् त्वशेषेण शृणुयां तव तेजसा ॥ ७ ॥ धृतराष्ट्रने कहा—ब्रह्मर्षिप्रवर! मुझे अपने कुटुम्बीजनोंका वध देखना अच्छा नहीं लगता; परंतु आपके प्रभावसे इस युद्धका सारा वृत्तान्त सुन सकूँ, ऐसी कृपा आप अवश्य कीजिये ॥ ७ ॥

वैशम्पायन उवाच एतस्मिन् नेच्छति द्रष्टुं संग्रामं श्रोतुमिच्छति । वराणामीश्वरो व्यासः संजयाय वरं ददौ ॥ ८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! व्यासजीने देखा, धृतराष्ट्र युद्धका दृश्य देखना तो नहीं चाहता, परंतु उसका पूरा समाचार सुनना चाहता है। तब वर देनेमें समर्थ उन महर्षिने संजयको वर देते हुए कहा— ॥ ८ ॥ एष ते संजयो राजन् युद्धमेतद् वदिष्यति । एतस्य सर्वसंग्रामे न परोक्षं भविष्यति ॥ ९ ॥ ‘राजन्! यह संजय आपको इस युद्धका सब समाचार बताया करेगा। सम्पूर्ण संग्रामभूमिमें कोई ऐसी बात नहीं होगी, जो इसके प्रत्यक्ष न हो ॥ ९ ॥ चक्षुषा संजयो राजन् दिव्येनैव समन्वितः । कथयिष्यति ते युद्धं सर्वज्ञश्च भविष्यति ॥ १० ॥ ‘राजन्! संजय दिव्य दृष्टिसे सम्पन्न होकर सर्वज्ञ हो जायगा और तुम्हें युद्धकी बात बतायेगा ॥ १० ॥ प्रकाशं वाप्रकाशं वा दिवा वा यदि वा निशि । मनसा चिन्तितमपि सर्वं वेत्स्यति संजयः ॥ ११ ॥ ‘कोई भी बात प्रकट हो या अप्रकट, दिनमें हो या रातमें अथवा वह मनमें ही क्यों न सोची गयी हो, संजय सब कुछ जान लेगा ॥ ११ ॥ नैनं शस्त्राणि छेत्स्यन्ति नैनं बाधिष्यते श्रमः । गावल्गणिरयं जीवन् युद्धादस्माद् विमोक्ष्यते ॥ १२ ॥ ‘इसे कोई हथियार नहीं काट सकता। इसे परिश्रम या थकावटकी बाधा भी नहीं होगी। गवलगणका पुत्र यह संजय इस युद्धसे जीवित बच जायगा ॥ १२ ॥ अहं तु कीर्तिमेतेषां कुरूणां भरतर्षभ । पाण्डवानां च सर्वेषां प्रथयिष्यामि मा शुचः ॥ १३ ॥ ‘भरतश्रेष्ठ! मैं इन समस्त कौरवों और पाण्डवोंकी कीर्तिका तीनों लोकोंमें विस्तार करूँगा। तुम शोक न करो ॥ १३ ॥