महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1237, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिष्टमेतन्नरव्याघ्र नाभिशोचितुमर्हसि । न चैव शक्यं संयन्तुं यतो धर्मस्ततो जयः ॥ १४ ॥ ‘नरश्रेष्ठ! यह दैवका विधान है। इसे कोई मेट नहीं सकता। अतः इसके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। जहाँ धर्म है, उसी पक्षकी विजय होगी’ ॥ १४ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा स भगवान् कुरूणां प्रपितामहः । पुनरेव महाभागो धृतराष्ट्रमुवाच ह ॥ १५ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! ऐसा कहकर कुरुकुलके पितामह महाभाग भगवान् व्यास पुनः धृतराष्ट्रसे बोले— ॥ १५ ॥
इह युद्धे महाराज भविष्यति महान् क्षयः । तथेह च निमित्तानि भयान्युपलक्षये ॥ १६ ॥ ‘महाराज! इस युद्धमें महान् नर-संहार होगा; क्योंकि मुझे इस समय ऐसे ही भयदायक अपशकुन दिखायी देते हैं’ ॥ १६ ॥
श्येना गृध्राश्च काकाश्च कङ्काश्च सहिता बकैः । सम्पतन्ति नगाग्रेषु समवायांश्च कुर्वते ॥ १७ ॥ ‘बाज, गीध, कौवे, कंक और बगुले वृक्षोंके अग्रभागपर आकर बैठते तथा अपना समूह एकत्र करते हैं’ ॥ १७ ॥
अभ्यग्रं च प्रपश्यन्ति युद्धमानन्दिनो द्विजाः । क्रव्यादा भक्षयिष्यन्ति मांसानि गजवाजिनाम् ॥ १८ ॥ निर्दयं चाभिवाशन्तो भैरवा भयवेदिनः । कङ्काः प्रयान्ति मध्येन दक्षिणामभितो दिशम् ॥ १९ ॥ ‘ये पक्षी अत्यन्त आनन्दित होकर युद्धस्थलको बहुत निकटसे आकर देखते हैं। इससे सूचित होता है कि मांसभक्षी पशु-पक्षी आदि प्राणी हाथियों और घोड़ोंके मांस खायेंगे। भयकी सूचना देनेवाले कंक पक्षी कठोर स्वरमें बोलते हुए सेनाके बीचसे होकर दक्षिण दिशाकी ओर जाते हैं’ ॥ १८-१९ ॥
उभे पूर्वापरे संध्ये नित्यं पश्यामि भारत । उदयास्तमने सूर्यं कबन्धैः परिवारितम् ॥ २० ॥ ‘भारत! मैं प्रातः और सायं दोनों संध्याओंके समय उदय और अस्तकी वेलामें सूर्यदेवको प्रतिदिन कबन्धोंसे घिरा हुआ देखता हूँ’ ॥ २० ॥
श्वेतलोहितपर्यन्ताः कृष्णग्रीवाः सविद्युतः । विवर्णाः परिघाः संधौ भानुमन्तमवारयन् ॥ २१ ॥