महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1238, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें'संध्याके समय सूर्यदेवको तिरंगे घेरोंने सब ओरसे घेर रखा था। उनमें श्वेत और लाल रंगके घेरे दोनों किनारोंपर थे और मध्यमें काले रंगका घेरा दिखायी देता था। इन घेरोंके साथ बिजलियाँ भी चमक रही थीं ।। २१ ।। ज्वलितार्केन्दुनक्षत्रं निर्विशेषदिनक्षपम् । अहोरात्रं मया दृष्टं तद् भयाय भविष्यति ।। २२ ।। 'मुझे दिन और रातका समय ऐसा दिखायी दिया है जिसमें सूर्य, चन्द्रमा और तारे जलते-से जान पड़ते थे। दिन और रातमें कोई विशेष अन्तर नहीं दिखायी देता था। यह लक्षण भय लानेवाला होगा ।। २२ ।। अलक्ष्यः प्रभयाहीनः पौर्णमासीं च कार्त्तिकीम् । चन्द्रोऽभूदग्निवर्णश्च पद्मवर्णनभस्तले ।। २३ ।। 'कार्तिककी पूर्णिमाको कमलके समान नीलवर्णके आकाशमें चन्द्रमा प्रभाहीन होनेके कारण दृष्टिगोचर नहीं हो पाता था तथा उसकी कान्ति भी अग्निके समान प्रतीत होती थी ।। २३ ।। स्वप्स्यन्ति निहता वीरा भूमिमावृत्य पार्थिवाः । राजानो राजपुत्राश्च शूराः परिघबाहवः ।। २४ ।। 'इसका फल यह है कि परिघके समान मोटी बाहुओंवाले बहुत-से शूरवीर नरेश तथा राजकुमार मारे जाकर पृथ्वीको आच्छादित करके रणभूमिमें शयन करेंगे ।। २४ ।। अन्तरिक्षे वराहस्य वृषदंशस्य चोभयोः । प्रणादं युद्ध्यतो रात्रौ रौद्रं नित्यं प्रलक्षये ।। २५ ।। 'सूअर और बिलाव दोनों आकाशमें उछल-उछलकर रातमें लड़ते और भयानक गर्जना करते हैं। यह बात मुझे प्रतिदिन दिखायी देती है ।। २५ ।। देवताप्रतिमाश्चैव कम्पन्ति च हसन्ति च । वमन्ति रुधिरं चास्यैः खिद्यन्ति प्रपतन्ति च ।। २६ ।। 'देवताओंकी मूर्तियाँ काँपती, हँसती, मुँहसे खून उगलती, खिन्न होती और गिर पड़ती हैं ।। २६ ।। अनाहता दुन्दुभयः प्रणदन्ति विशाम्पते । अयुक्ताश्च प्रवर्तन्ते क्षत्रियाणां महारथाः ।। २७ ।। 'राजन्! दुन्दुभियाँ बिना बजाये बज उठती हैं और क्षत्रियोंके बड़े-बड़े रथ बिना जोते ही चल पड़ते हैं ।। २७ ।। कोकिलाः शतपत्राश्च चाषा भासाः शुकास्तथा । सारसाश्च मयूराश्च वाचो मुञ्चन्ति दारुणाः ।। २८ ।। 'कोयल, शतपत्र, नीलकण्ठ, भास (चील्ह), शुक, सारस तथा मयूर भयंकर बोली बोलते हैं ।। २८ ।।