भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1241

कुछ स्त्रियाँ एक ही साथ चार-चार या पाँच-पाँच कन्याएँ पैदा करती हैं। वे कन्याएँ पैदा होते ही नाचती, गाती तथा हँसती हैं ।। ७ ।। पृथग्जनस्य सर्वस्य क्षुद्रकाः प्रहसन्ति च । नृत्यन्ति परिगायन्ति वेदयन्तो महत् भयम् ।। ८ ।। समस्त नीच जातियोंके घरोंमें उत्पन्न हुए काने, कुबड़े आदि बालक भी महान् भयकी सूचना देते हुए जोर-जोरसे हँसते, गाते और नाचते हैं ।। ८ ।। प्रतिमाश्चालिखन्त्येताः सशस्त्राः कालचोदिताः । अन्योन्यमभिधावन्ति शिशवो दण्डपाणयः ।। ९ ।। ये सब कालसे प्रेरित हो हाथोंमें हथियार लिये मूर्तियाँ लिखते और बनाते हैं। छोटे-छोटे बच्चे हाथमें डंडा लिये एक-दूसरेपर धावा करते हैं ।। ९ ।। अन्योन्यमभिमृद्नन्ति नगराणि युयुत्सवः । पद्मोत्पलानि वृक्षेषु जायन्ते कुमुदानि च ।। १० ।। और कृत्रिम नगर बनाकर परस्पर युद्धकी इच्छा रखते हुए उन नगरोंको रौंदकर मिट्टीमें मिला देते हैं। पद्म, उत्पल और कुमुद आदि जलीय पुष्प वृक्षोंपर पैदा होते हैं ।। १० ।। विष्वग्वाताश्च वान्त्युग्रा रजो नाप्युपशाम्यति । अभीक्ष्णं कम्पते भूमिरर्कं राहुरुपैति च ।। ११ ।। चारों ओर भयंकर आँधी चल रही है, धूलका उड़ना शान्त नहीं हो रहा है, धरती बारंबार काँप रही है तथा राहु सूर्यके निकट जा रहा है ।। ११ ।। श्वेतो ग्रहस्तथा चित्रां समतिक्रम्य तिष्ठति । अभावं हि विशेषेण कुरूणां तत्र पश्यति ।। १२ ।। केतु चित्राका अतिक्रमण करके स्वातीपर स्थित हो रहा है;* उसकी विशेषरूपसे कुरुवंशके विनाशपर ही दृष्टि है ।। १२ ।। धूमकेतुर्महाघोरः पुष्यं चाक्रम्य तिष्ठति । सेनयोरशिवं घोरं करिष्यति महाग्रहः ।। १३ ।। अत्यन्त भयंकर धूमकेतु पुष्य नक्षत्रपर आक्रमण करके वहीं स्थित हो रहा है। यह महान् उपग्रह दोनों सेनाओंका घोर अमंगल करेगा ।। १३ ।। मघास्वङ्गारको वक्रः श्रवणे च बृहस्पतिः । भगं नक्षत्रमाक्रम्य सूर्यपुत्रेण पीड्यते ।। १४ ।। मंगल वक्र होकर मघा नक्षत्रपर स्थित है, बृहस्पति श्रवण नक्षत्रपर विराजमान है तथा सूर्यपुत्र शनि पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्रपर पहुँचकर उसे पीड़ा दे रहा है ।। १४ ।। शुक्रः प्रोष्ठपदे पूर्वे समारुह्य विरोचते । उत्तरे तु परिक्रम्य सहितः समुदीक्षते ।। १५ ।।