महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशुक्र पूर्वा भाद्रपदापर आरूढ़ हो प्रकाशित हो रहा है और सब ओर घूम-फिरकर परिघ नामक उपग्रहके साथ उत्तरा भाद्रपदा नक्षत्रपर दृष्टि लगाये हुए है ।। १५ ।। श्वेतो ग्रहः प्रज्वलितः सधूम इव पावकः । ऐन्द्रं तेजस्वि नक्षत्रं ज्येष्ठामाक्रम्य तिष्ठति ।। १६ ।। केतु नामक उपग्रह धूमयुक्त अग्निके समान प्रज्वलित हो इन्द्रदेवतासम्बन्धी तेजस्वी ज्येष्ठा नक्षत्रपर जाकर स्थित है ।। १६ ।। ध्रुवं प्रज्वलितो घोरमपसव्यं प्रवर्तते । रोहिणीं पीडयत्येवमुभौ च शशिभास्करौ । चित्रास्वात्यन्तरे चैव विष्ठितः परुषग्रहः ।। १७ ।। चित्रा और स्वातीके बीचमें स्थित हुआ क्रूर ग्रह राहु सदा वक्री होकर रोहिणी तथा चन्द्रमा और सूर्यको पीड़ा पहुँचाता है तथा अत्यन्त प्रज्वलित होकर ध्रुवकी बायीं ओर जा रहा है, जो घोर अनिष्टका सूचक है ।। १७ ।। वक्रानुवक्रं कृत्वा च श्रवणं पावकप्रभः । ब्रह्मराशिं समावृत्य लोहिताङ्गो व्यवस्थितः ।। १८ ।। अग्निके समान कान्तिमान् मंगल ग्रह (जिसकी स्थिति मघा नक्षत्रमें बतायी गयी है) बारंबार वक्र होकर ब्रह्मराशि (बृहस्पतिसे युक्त नक्षत्र) श्रवणको पूर्णरूपसे आवृत करके स्थित है ।। १८ ।। सर्वसस्यपरिच्छन्ना पृथिवी सस्यमालिनी । पञ्चशीर्षा यवाश्चापि शतशीर्षाश्च शालयः ।। १९ ।। (इसका प्रभाव खेतीपर अनुकूल पड़ा है) पृथ्वी सब प्रकारके अनाजके पौधोंसे आच्छादित है, शस्यकी मालाओंसे अलंकृत है, जौमें पाँच-पाँच और जड़हन धानमें सौ-सौ बालियाँ लग रही हैं ।। १९ ।। प्रधानाः सर्वलोकस्य यास्वायत्तमिदं जगत् । ता गावः प्रस्रुता वत्सैः शोणितं प्रक्षरन्त्युत ।। २० ।। जो सम्पूर्ण जगत्में माताके समान प्रधान मानी जाती हैं, यह समस्त संसार जिनके अधीन है, वे गौएँ बछड़ोंसे पिन्हा जानेके बाद अपने थनोंसे खून बहाती हैं ।। २० ।। निश्चेरुरर्चिषश्चापात् खड्गाश्च ज्वलिता भृशम् । व्यक्तं पश्यन्ति शस्त्राणि संग्रामं समुपस्थितम् ।। २१ ।। योद्धाओंके धनुषसे आगकी लपटें निकलने लगी हैं, खड्ग अत्यन्त प्रज्वलित हो उठे हैं मानो सम्पूर्ण शस्त्र स्पष्टरूपसे यह देख रहे हैं कि संग्राम उपस्थित हो गया है ।। २१ ।। अग्निवर्णा यथा भासः शस्त्राणामुदकस्य च । कवचानां ध्वजानां च भविष्यति महाक्षयः ।। २२ ।।