भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1269

सुखदायक होता है। वहाँके सुन्दर सरोवर अत्यन्त मनोरम होते हैं। उनका स्पर्श सुखद जान पड़ता है ।। ६ ।।

देवलोकच्युताः सर्वे जायन्ते तत्र मानवाः ।
शुक्लाभिजनसम्पन्नाः सर्वे सुप्रियदर्शनाः ।। ७ ।।
वहाँ देवलोकसे भूतलपर आये हुए समस्त पुण्यात्मा मनुष्य ही जन्म ग्रहण करते हैं। ये सभी उत्तम कुलसे सम्पन्न और देखनेमें अत्यन्त प्रिय होते हैं ।। ७ ।।

मिथुनानि च जायन्ते स्त्रियश्चाप्सरसोपमाः ।
तेषां ते क्षीरिणां क्षीरं पिबन्त्यमृतसंनिभम् ।। ८ ।।
वहाँ स्त्री-पुरुषोंके जोड़े भी उत्पन्न होते हैं। स्त्रियाँ अप्सराओंके समान सुन्दरी होती हैं। उत्तरकुरुके निवासी क्षीरी वृक्षोंके अमृततुल्य दूध पीते हैं ।। ८ ।।

मिथुनं जायते काले समं तच्च प्रवर्धते ।
तुल्यरूपगुणोपेतं समवेषं तथैव च ।। ९ ।।
वहाँ स्त्री-पुरुषोंके जोड़े एक ही साथ उत्पन्न होते और साथ-साथ बढ़ते हैं। उनके रूप, गुण और वेष सब एक-से होते हैं ।। ९ ।।

एकैकमनुरक्तं च चक्रवाकसमं विभो ।
निरामयाश्च ते लोका नित्यं मुदितमानसाः ।। १० ।।
प्रभो! वे चकवा-चकवीके समान सदा एक-दूसरेके अनुकूल बने रहते हैं। उत्तरकुरुके लोग सदा नीरोग और प्रसन्नचित्त रहते हैं ।। १० ।।

दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च ।
जीवन्ति ते महाराज न चान्योन्यं जहत्युत ।। ११ ।।
महाराज! वे ग्यारह हजार वर्षोंतक जीवित रहते हैं। एक-दूसरेका कभी त्याग नहीं करते ।। ११ ।।

भारुण्डा नाम शकुनास्तीक्ष्णतुण्डा महाबलाः ।
तान् निर्हरन्तीह मृतान् दरीषु प्रक्षिपन्ति च ।। १२ ।।
वहाँ भारुण्ड नामके महाबली पक्षी हैं, जिनकी चोंचें बड़ी तीखी होती हैं। वे वहाँके मरे हुए लोगों-की लाशें उठाकर ले जाते और कन्दराओंमें फेंक देते हैं ।। १२ ।।

उत्तराः कुरवो राजन् व्याख्यातास्ते समासतः ।
मेरोः पार्श्वमहं पूर्वं वक्ष्याम्यथ यथातथम् ।। १३ ।।
राजन्! इस प्रकार मैंने आपसे थोड़ेमें उत्तरकुरु-वर्षका वर्णन किया। अब मैं मेरुके पूर्वभागमें स्थित भद्राश्ववर्षका यथावत् वर्णन करूँगा ।। १३ ।।

तस्य मूर्धाभिषेकस्तु भद्राश्वस्य विशाम्पते ।
भद्रसालवनं यत्र कालाम्रश्च महाद्रुमः ।। १४ ।।