महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1270, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रजानाथ! भद्राश्ववर्षके शिखरपर भद्रशाल नामका एक वन है एवं वहाँ कालाम्र नामक महान् वृक्ष भी है ।। १४ ।। कालाम्रस्तु महाराज नित्यपुष्पफलः शुभः । द्रुमश्च योजनोत्सेधः सिद्धचारणसेवितः ।। १५ ।। महाराज! कालाम्रवृक्ष बहुत ही सुन्दर और एक योजन ऊँचा है। उसमें सदा फूल और फल लगे रहते हैं। सिद्ध और चारण पुरुष उसका सदा सेवन करते हैं ।। १५ ।। तत्र ते पुरुषाः श्वेतास्तेजोयुक्ता महाबलाः । स्त्रियः कुमुदवर्णाश्च सुन्दर्यः प्रियदर्शनाः ।। १६ ।। वहाँके पुरुष श्वेतवर्णके होते हैं। वे तेजस्वी और महान् बलवान् हुआ करते हैं। वहाँकी स्त्रियाँ कुमुद-पुष्पके समान गौरवर्णवाली, सुन्दरी तथा देखनेमें प्रिय होती हैं ।। १६ ।। चन्द्रप्रभाश्चन्द्रवर्णाः पूर्णचन्द्रनिभाननाः । चन्द्रशीतलगात्र्यश्च नृत्यगीतविशारदाः ।। १७ ।। उनकी अंगकान्ति एवं वर्ण चन्द्रमाके समान है। उनके मुख पूर्णचन्द्रके समान मनोहर होते हैं। उनका एक-एक अंग चन्द्ररश्मियोंके समान शीतल प्रतीत होता है। वे नृत्य और गीतकी कलामें कुशल होती हैं ।। १७ ।। दश वर्षसहस्राणि तत्रायुर्भरतर्षभ । कालाम्ररसपीतास्ते नित्यं संस्थितयौवनाः ।। १८ ।। भरतश्रेष्ठ! वहाँके लोगोंकी आयु दस हजार वर्षकी होती है। वे कालाम्रवृक्षका रस पीकर सदा जवान बने रहते हैं ।। १८ ।। दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेण तु । सुदर्शनो नाम महाज्जम्बूवृक्षः सनातनः ।। १९ ।। नीलगिरिके दक्षिण और निषधके उत्तर सुदर्शन नामक एक विशाल जामुनका वृक्ष है, जो सदा स्थिर रहनेवाला है ।। १९ ।। सर्वकामफलः पुण्यः सिद्धचारणसेवितः । तस्य नाम्ना समाख्यातो जम्बूद्वीपः सनातनः ।। २० ।। वह समस्त मनोवांछित फलोंको देनेवाला, पवित्र तथा सिद्धों और चारणोंका आश्रय है। उसीके नामपर यह सनातन प्रदेश जम्बूद्वीपके नामसे विख्यात है ।। २० ।। योजनानां सहस्रं च शतं च भरतर्षभ । उत्सेधो वृक्षराजस्य दिवस्पृङ्मनुजेश्वर ।। २१ ।। भरतश्रेष्ठ! मनुजेश्वर! उस वृक्षराजकी ऊँचाई ग्यारह सौ योजन है। वह (ऊँचाई) स्वर्गलोकको स्पर्श करती हुई-सी प्रतीत होती है ।। २१ ।। अरत्नीनां सहस्रं च शतानि दश पञ्च च । परिणाहस्तु वृक्षस्य फलानां रसभेदिनाम् ।। २२ ।।