महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउसके फलोंमें जब रस आ जाता है अर्थात् जब वे पक जाते हैं, तब अपने-आप टूटकर गिर जाते हैं। उन फलोंकी लंबाई ढाई हजार अरत्नि* मानी गयी है ।। २२ ।। पतमानानि तान्युर्वीं कुर्वन्ति विपुलं स्वनम् । मुञ्चन्ति च रसं राजंस्तस्मिन् रजतसंनिभम् ।। २३ ।। राजन्! वे फल इस पृथ्वीपर गिरते समय भारी धमाकेकी आवाज करते हैं और उस भूतलपर सुवर्णसदृश रस बहाया करते हैं ।। २३ ।। तस्या जम्ब्वाः फलरसो नदी भूत्वा जनाधिप । मेरुं प्रदक्षिणं कृत्वा सम्प्रयात्युत्तरान् कुरून् ।। २४ ।। जनेश्वर! उस जम्बूके फलोंका रस नदीके रूपमें परिणत होकर मेरुगिरिकी प्रदक्षिणा करता हुआ उत्तर-कुरुवर्षमें पहुँच जाता है ।। २४ ।। तत्र तेषां मनःशान्तिर्न पिपासा जनाधिप । तस्मिन् फलरसे पीते न जरा बाधते च तान् ।। २५ ।। राजन्! फलोंके उस रसका पान कर लेनेपर वहाँके निवासियोंके मनमें पूर्ण शान्ति और प्रसन्नता रहती है। उन्हें पिपासा अथवा वृद्धावस्था कभी नहीं सताती है ।। २५ ।। तत्र जाम्बूनदं नाम कनकं देवभूषणम् । इन्द्रगोपकसंकाशं जायते भास्वरं तु तत् ।। २६ ।। उस जम्बू नदीसे जाम्बूनद नामक सुवर्ण प्रकट होता है, जो देवताओंका आभूषण है। वह इन्द्रगोपके समान लाल और अत्यन्त चमकीला होता है ।। २६ ।। तरुणादित्यवर्णाश्च जायन्ते तत्र मानवाः । तथा माल्यवतः शृङ्गे दृश्यते हव्यवाट् सदा ।। २७ ।। वहाँके लोग प्रातःकालीन सूर्यके समान कान्तिमान् होते हैं। माल्यवान् पर्वतके शिखरपर सदा अग्निदेव प्रज्वलित दिखायी देते हैं ।। २७ ।। नाम्ना संवर्तको नाम कालाग्निर्भरतर्षभ । तथा माल्यवतः शृङ्गे पूर्वपूर्वानुगण्डिका ।। २८ ।। भरतश्रेष्ठ! वे वहाँ संवर्तक एवं कालाग्निके नामसे प्रसिद्ध हैं। माल्यवान्के शिखरपर पूर्व-पूर्वकी ओर नदी प्रवाहित होती है ।। २८ ।। योजनानां सहस्राणि पञ्चषण्माल्यवानथ । महारजतसंकाशा जायन्ते तत्र मानवाः ।। २९ ।। माल्यवान्का विस्तार पाँच-छः हजार योजन है। वहाँ सुवर्णके समान कान्तिमान् मानव उत्पन्न होते हैं ।। २९ ।। ब्रह्मलोकच्युताः सर्वे सर्वे सर्वेषु साधवः । तपस्तप्यन्ति ते तीव्रं भवन्ति ह्यूर्ध्वरेतसः । रक्षणार्थं तु भूतानां प्रविशन्ते दिवाकरम् ।। ३० ।।